


कुशीनगर।
हाटा कोतवाली के बाहर गुरुवार को उस समय हड़कंप मच गया जब खड़ी एक डीसीएम से कराहते हुए गोवंश की आवाज़ें आने लगीं। आवाजें सुनकर मौके पर पहुंचे ग्रामीणों ने जब वाहन के भीतर झांका, तो उनका दिल दहल गया — अंदर कई गायें और बछड़े भूख-प्यास से बेहाल हालत में तड़प रहे थे। कुछ गायें गर्भवती थीं और कुछ बछड़े थकावट से बेसुध पड़े थे। यह दृश्य देखकर ग्रामीणों ने तत्परता दिखाते हुए उन्हें पानी पिलाया और उनकी जान बचाने की कोशिश की। इसी दौरान किसी ने इस पूरी घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा कर दिया, जो कुछ ही घंटों में वायरल हो गया।
रात में पुलिस ने संदिग्ध वाहन किया था जब्त
मामले की तह में जाने पर जो सच्चाई सामने आई, उसने सभी को हैरान कर दिया। जानकारी के अनुसार, बुधवार की रात करीब एक बजे हाटा पुलिस ने संदिग्ध गतिविधि के आधार पर एक डीसीएम वाहन को रोका था। वाहन की तलाशी लेने पर उसमें आठ गोवंश पाए गए। पुलिस ने वाहन चालक और एक अन्य व्यक्ति को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की। प्रारंभिक जांच में मामला संदिग्ध लगने पर पुलिस ने वाहन को कोतवाली परिसर के बाहर खड़ा करा दिया।
भूखे-प्यासे गोवंश का दर्दनाक मंजर
गुरुवार की सुबह से शाम तक वह डीसीएम वहीं खड़ा रहा, लेकिन किसी ने यह ध्यान नहीं दिया कि अंदर जीवित पशु हैं, जिन्हें चारा और पानी की आवश्यकता है। दोपहर बाद जब कुछ स्थानीय लोग वहां से गुजरे, तो उन्हें भीतर से करुण कराह सुनाई दी। उन्होंने जब अंदर झांका तो नजारा विचलित करने वाला था — गर्मी, बदबू और ऑक्सीजन की कमी से कई गोवंश सांस लेने में तकलीफ झेल रहे थे। ग्रामीणों ने त्वरित निर्णय लेते हुए बाल्टी और बोतलों से पानी पिलाया और इस दौरान वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया।
वायरल वीडियो ने मचाई हलचल
वीडियो वायरल होते ही पूरे जनपद में हड़कंप मच गया। प्रशासन पर लापरवाही के आरोप लगने लगे। सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाए कि जब वाहन को पुलिस ने जब्त किया था तो फिर पशुओं की सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी किसकी थी? वीडियो में दिख रहा था कि कई गायें गर्दन झुकाकर सांस लेने में जूझ रही थीं। लोगों ने इसे पशु क्रूरता का उदाहरण बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की।
कोतवाल बोले—चारा-पानी पिलाया गया था, साक्ष्य हेतु दोबारा चढ़ाया गया
इस पूरे घटनाक्रम पर जब मीडिया ने कोतवाल रामसहाय चौहान से बात की, तो उन्होंने बताया कि डीसीएम में कुल आठ गोवंश मौजूद थे जिन्हें रात में शक के आधार पर पकड़ा गया था। उन्होंने कहा कि “सुबह पशुओं को उतारकर चारा और पानी दिया गया था, लेकिन मामले की साक्ष्य प्रक्रिया के तहत उन्हें दोबारा वाहन में चढ़ा दिया गया था।” हालांकि ग्रामीणों का कहना था कि दिनभर गोवंश वाहन में ही बंद रहे और किसी ने उन्हें देखने की जहमत तक नहीं उठाई।
एसपी ने दिए जांच के आदेश, सीओ पहुंचे मौके पर
वायरल वीडियो की सूचना मिलते ही पुलिस अधीक्षक केशव कुमार ने तत्काल मामले का संज्ञान लिया और कसया क्षेत्राधिकारी कुंदन सिंह को जांच के लिए मौके पर भेजा। सीओ ने घटनास्थल पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया और संबंधित पुलिसकर्मियों से पूछताछ की। प्रारंभिक जांच में यह तथ्य सामने आया कि डीसीएम में मौजूद सभी गोवंश छपिया मेले से खरीदे गए थे और ले जाए जा रहे थे। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि गोवंश की खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड या दस्तावेज वैध थे या नहीं।
जनता में आक्रोश, पशु कल्याण विभाग की भूमिका पर उठे सवाल
इस घटना के बाद स्थानीय लोगों और पशु प्रेमियों में गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यदि पुलिस ने पशुओं को संरक्षण के नाम पर हिरासत में लिया था, तो उनकी सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी भी उसी की थी। भूख-प्यास से तड़पते गोवंश का वीडियो न सिर्फ प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या पशु क्रूरता कानून केवल कागज़ों में सीमित रह गया है?
पुलिस बोली—लापरवाही पर होगी कार्रवाई
एसपी केशव कुमार ने स्पष्ट किया है कि यदि जांच में किसी भी प्रकार की लापरवाही या पशु क्रूरता साबित होती है, तो संबंधित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा, “पशु हमारे समाज का हिस्सा हैं। यदि पुलिस अभिरक्षा में रहते हुए उनके साथ ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है, तो यह अस्वीकार्य है। जांच पूरी पारदर्शिता से की जा रही है।”
जांच से खुला ‘गोवंश तड़पते डीसीएम’ केस का सच
शाम तक चली जांच के बाद जो रिपोर्ट सामने आई, उसने सोशल मीडिया पर चल रहे कई भ्रमों को दूर किया। पाया गया कि गोवंश तस्करी के शक में पकड़े गए थे, लेकिन जांच के दौरान यह प्रमाण मिला कि पशु वास्तव में छपिया पशु मेले से खरीदे गए थे और उन्हें कानूनी रूप से लाया जा रहा था। हालांकि, गाड़ी को लंबे समय तक बिना पर्याप्त देखभाल के खड़ा रखना एक गंभीर लापरवाही मानी जा रही है।
अंत में… संवेदनशीलता की जरूरत
यह पूरा मामला एक बड़ा सबक छोड़ गया — कानून के नाम पर कार्रवाई करते समय मानवीयता नहीं भूलनी चाहिए। चाहे वह पुलिस हो या आम नागरिक, पशु भी जीवित प्राणी हैं जिनकी पीड़ा को समझना हमारा नैतिक कर्तव्य है। हाटा की यह घटना प्रशासन के लिए चेतावनी है कि भविष्य में ऐसी संवेदनहीनता दोबारा न दोहराई जाए।
