
हर मुकदमे से नाम बाहर, अब चौकी प्रभारी संग नजदीकी की तस्वीर ने बढ़ाई बेचैनी — क्या पुलिस के भीतर से ही लीक हो रही है न्याय की नब्ज़?
कुशीनगर।
पूर्वांचल के कई जिलों में फैले पशु तस्करी के नेटवर्क पर एक बार फिर उंगलियाँ उठी हैं। इस बार चर्चा के केंद्र में है — वहाब पुत्र जब्बार, निवासी नंदौर, जनपद संतकबीरनगर, जो वर्षों से पशु तस्करी के मामलों में नामजद होते हुए भी हर बार चार्जशीट से अपना नाम गायब कराने में सफल हो जाता है।
सूत्र बताते हैं कि वहाब की पहुँच इतनी मजबूत है कि थानों से लेकर उच्च पुलिस पदों तक उसका “सेटिंग सर्किल” सक्रिय रहता है। ताज़ा मामला तरया सुजान थाना क्षेत्र का है, जहाँ मुकदमा संख्या 212/24 में विवेचक रहे तत्कालीन चौकी प्रभारी अरविंद कुमार ने कथित रूप से वहाब और वाहन स्वामी दोनों के नाम फर्द से हटा दिए।
अब वही दरोगा, वही मुकदमा और वही आरोपी एक तस्वीर के जरिए फिर से सुर्खियों में हैं। तस्वीर में वहाब और उपनिरीक्षक अरविंद कुमार आत्मीय भाव से एकसाथ दिख रहे हैं।
“तस्वीर बहुत कुछ कहती है…” — सूत्रों का दावा
पुलिस सूत्र बताते हैं कि यह तस्वीर कुछ महीने पुरानी है। यह वह दौर था जब मुकदमे की विवेचना चल रही थी।
“अगर आप गौर से देखें तो तस्वीर में सहजता और आत्मीयता सब कुछ बयान कर रही है,” एक वरिष्ठ पुलिसकर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया।
इसी दौरान, गोरखपुर में पशु तस्करी से जुड़ा एक बड़ा मामला उजागर हुआ था। उसमें कई पुलिसकर्मियों की भूमिका संदिग्ध बताई गई थी और अरविंद कुमार का नाम भी उसी लिस्ट में आया था। इसके बाद उन्हें पनिशमेंट पोस्टिंग के तहत जिले के पश्चिम क्षेत्र में स्थानांतरित किया गया।
हर मुकदमे से नाम बाहर — सेटिंग का पुराना फॉर्मूला
वहाब की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं।
उस पर पशु तस्करी, अवैध परिवहन और सरकारी आदेशों की अवहेलना से जुड़े कई मुकदमे दर्ज हुए —
अपराध संख्या 01/16, थाना बखिरा (संतकबीरनगर)
अपराध संख्या 159/19, थाना पटहेरवा (कुशीनगर)
अपराध संख्या 174/20, थाना दुबौलिया (बस्ती)
अपराध संख्या 194/20 और 212/24, थाना तरया सुजान (कुशीनगर)
हर बार मुकदमा दर्ज हुआ, जांच हुई, लेकिन चार्जशीट दाखिल होने तक वहाब का नाम रहस्यमय तरीके से गायब।
सूत्र बताते हैं कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक “अंदरूनी सेटिंग सिस्टम” का हिस्सा है, जो वर्षों से ऐसे आरोपियों को बचाने का काम करता रहा है।
“किसी केस से नाम हटना सिर्फ विवेचक का निर्णय नहीं होता। इसके पीछे ऊपर तक की स्वीकृति होती है — थानाध्यक्ष, सीओ, और कई बार उससे ऊपर तक,” — एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी ने बताया।
वहाब और दरोगा की मुंबई यात्रा की भी चर्चा
सूत्र बताते हैं कि तस्वीर के अलावा कई और बातें भी सामने आई हैं।
वहाब और अरविंद कुमार के बीच नजदीकियां इतनी गहरी थीं कि दोनों ने एक ही UP58 नंबर की स्कॉर्पियो में सफर किया था। बताया जा रहा है कि वे दोनों मुंबई तक साथ गए थे, और हाल ही में रामपुर का दौरा भी साथ में किया।
हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पुलिस सूत्रों का कहना है कि “अगर दोनों के मोबाइल लोकेशन और वाहन की जीपीएस ट्रैकिंग कराई जाए तो पूरी सच्चाई सामने आ सकती है।”
इसी बीच यह भी चर्चा है कि वहाब की ऐसी तस्वीरें और वीडियो कई थानों के थानाध्यक्षों के साथ भी मौजूद हैं। एक तस्वीर में तो वह दिन के उजाले में एक पेट्रोल पंप पर तीन अधिकारियों के साथ बैठा नजर आ रहा है।
थाने से लेकर सीओ दफ्तर तक — ‘सेटिंग चेन’ का बड़ा खुलासा
पुलिस सूत्रों के अनुसार, किसी भी मामले में आरोपियों का नाम हटाने की प्रक्रिया कई स्तरों पर होती है।
सबसे पहले विवेचक (दरोगा) रिपोर्ट तैयार करता है, फिर थानाध्यक्ष के हस्ताक्षर से वह फाइल सीओ दफ्तर भेजी जाती है। इसके बाद सीओ की “अनुमोदन टिप्पणी” लगने के बाद ही पत्रावली न्यायालय पहुंचती है।
“ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या सिर्फ दरोगा ही दोषी है, या पूरा सिस्टम एक साथ काम करता है?” — एक स्थानीय अधिवक्ता ने कहा।
तेजतर्रार कप्तान की हनक से रुकी तस्करी
हाल ही में जिले में नए पुलिस कप्तान के आने के बाद हालात बदले हैं।
सूत्रों के मुताबिक, कप्तान के निर्देश पर रात में सड़कों की गश्त बढ़ाई गई, सीमाई इलाकों में बैरिकेडिंग की व्यवस्था सख्त की गई, और तस्करी के रूट्स पर “इनविज़िबल वॉच” लगाई गई है।
परिणाम यह हुआ कि अब वही सड़कें, जहाँ पहले पशु तस्करी के ट्रक बेखौफ दौड़ते थे, आज शांत हैं।
“कप्तान साहब बिना दिखावे के काम करते हैं। उन्होंने सिस्टम को बिना गोली चलाए दुरुस्त किया है,” एक पुलिस सूत्र ने बताया।
लेकिन सवाल अब भी बाकी है — क्या तस्करी पर रोक के साथ-साथ उन पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई होगी, जिन्होंने ऐसे नेटवर्क को पनपने दिया?
फाइलें खुलेंगी तो कई चेहरे बेनकाब होंगे
सूत्रों का कहना है कि अब कप्तान स्तर से एक “इनहाउस रिव्यू” की तैयारी चल रही है।
यदि 212/24 तरया सुजान मुकदमा और उससे जुड़ी विवेचना रिपोर्ट की न्यायिक जांच हुई, तो यह मामला कई उच्चाधिकारियों की संलिप्तता तक पहुँच सकता है।
एक सूत्र ने बताया — “वहाब अकेला नहीं है, उसके पीछे पूरा तंत्र है। उसके फोन रिकॉर्ड, वाहन लोकेशन और बैंक लेनदेन की जांच अगर निष्पक्ष हो, तो कई यूनिफॉर्म वाले नाम सामने आ सकते हैं।”
अब जनता पूछ रही है — कौन है असली तस्कर?
गांवों और कस्बों में अब यह सवाल आम हो गया है कि —
👉 क्या पुलिस की आस्तीन में पल रहे तस्कर ही कानून की कार्रवाई में सबसे बड़ी रुकावट हैं?
👉 क्या अब भी ऐसे पुलिसकर्मी विभाग के भीतर बचे हैं जो तस्करों के लिए ‘ढाल’ का काम कर रहे हैं?
लोगों का कहना है कि कप्तान साहब ने तस्करी की जड़ें जरूर काटी हैं, मगर अब असली कसौटी यह है कि वे उन लोगों पर भी कार्रवाई करें जो तस्करों को बचाने का काम करते हैं।
निष्कर्ष: तस्वीर और मुकदमा — दोनों ही जांच का आधार
वहाब की यह तस्वीर, उसके खिलाफ दर्ज मुकदमे और चार्जशीट से बार-बार नाम गायब होने का सिलसिला, सब कुछ एक ही ओर इशारा करता है — सिस्टम की अंदरूनी सड़ांध।
अब मामला कप्तान के दरवाजे पर है।
अगर इस बार जांच निष्पक्ष हुई, तो यह सिर्फ वहाब का नहीं बल्कि पूरे नेटवर्क का चेहरा उजागर करेगी।
सूत्र बताते हैं कि वहाब की कुंडली अब खुलने को है —
और इस बार शायद कोई “सेटिंग” उसे बचा न पाए।
