विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष रिपोर्ट
कुशीनगर जनपद में प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला सीधे उच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है, जहां स्पष्ट रूप से यह सामने आया कि न्यायालय के आदेश के बावजूद भी जिम्मेदार अधिकारियों ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया।
रिट संख्या 14461/2026 में याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि 03 अक्टूबर 2023 को पारित आदेश के बाद भी उनकी बहाली अर्जी को लंबित रखा गया। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था पर सीधा प्रश्नचिन्ह है। जब आम नागरिक न्याय की आस में दर-दर भटकता है, तब उसे कार्यालयों से केवल टालमटोल और बहाने ही क्यों मिलते हैं?
सबसे गंभीर बात यह है कि आदेश-पत्र तक देने से इनकार किया गया। कभी फाइल उप-जिलाधिकारी के पास बताई गई, तो कभी सीधे मिलने पर भी कोई निर्देश नहीं दिया गया। क्या यह प्रशासनिक उदासीनता है या सुनियोजित देरी? यह सवाल अब जनता भी पूछ रही है।
और मामला यहीं नहीं रुकता। याचिका में यह भी आरोप है कि बहाली आवेदन के निस्तारण के लिए ₹50,000 की मांग की गई। अगर यह आरोप सही है, तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है। गरीब याचिकाकर्ताओं के लिए यह रकम देना संभव नहीं था, और शायद यही वजह है कि उनका मामला आज तक अटका पड़ा है।
उच्च न्यायालय ने फिलहाल सरकार की ओर से जवाब मांगा है और मामले को दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार न्यायालय को ही हस्तक्षेप करना पड़ेगा? क्या स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार अधिकारी अपनी जवाबदेही से मुक्त हैं?
यह घटना केवल एक मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का आईना है। प्रशासन को यह समझना होगा कि जनता अब चुप नहीं बैठेगी। पारदर्शिता और जवाबदेही अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है।
अब निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं—क्या सच सामने आएगा या फिर फाइलों के बीच ही दबकर रह जाएगा?
