
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। मुख्य पश्चिमी गंडक नहर के एपी तटबंध में 28 सितंबर की रात हुई टूट के बाद जहां बाढ़ और सिंचाई व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हुए हैं, वहीं अब बाढ़ खंड की कार्यप्रणाली और अधिशासी अभियंता महेश कुमार सिंह की लंबे समय से चली आ रही फील्ड तैनाती भी सवालों के घेरे में बताई जा रही है।
चर्चा का केंद्र सिर्फ तटबंध टूटने की घटना नहीं है, बल्कि यह भी है कि संवेदनशील बाढ़ प्रभावित जिले में तटबंधों की निगरानी और सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किस व्यवस्था के तहत वर्षों से एक ही अधिकारी के पास बनी रही।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार महेश कुमार सिंह वर्ष 2021-22 से कुशीनगर में तैनात हैं। इसी बीच उनका नाम चर्चित गोमती रिवर फ्रंट परियोजना से जुड़ी जांच के संदर्भ में सामने आने की बात कही जाती रही है। वर्ष 2023 में ऐसे अभियंताओं की फील्ड तैनाती को लेकर शासन स्तर से निर्देश जारी होने की चर्चा भी सामने आती रही है। ऐसे में एपी तटबंध टूटने के बाद उनकी कुशीनगर में बनी रही फील्ड जिम्मेदारी को लेकर नए सिरे से सवाल उठ रहे हैं।
तटबंध की निगरानी पर अब उठे सीधे सवाल
एपी तटबंध टूटने की घटना ने बाढ़ खंड की तैयारियों और निगरानी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के प्रभाव और तटबंध की सुरक्षा को लेकर चिंता के बीच सवाल यह है कि संवेदनशील तटबंधों की निगरानी, निरीक्षण, मरम्मत और संभावित खतरे की पहचान के लिए विभागीय स्तर पर क्या व्यवस्था थी?

यदि शासन स्तर पर वर्ष 2023 में फील्ड तैनाती को लेकर कोई प्रतिबंधात्मक निर्देश जारी हुआ था, तो उसकी प्रति, अनुपालन और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी भी सार्वजनिक जांच का विषय बनती है।
गोमती रिवर फ्रंट प्रकरण फिर चर्चा में
गोमती रिवर फ्रंट परियोजना को लेकर वर्ष 2017 में न्यायिक जांच और बाद में सीबीआई जांच की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी सामने आई थी। परियोजना में कथित अनियमितताओं को लेकर कई अभियंताओं और संबंधित पक्षों की भूमिका जांच के दायरे में आने की बात कही गई थी।
इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 2023 के कथित शासनादेश और फील्ड तैनाती से जुड़े निर्देश अब कुशीनगर में महेश कुमार सिंह की वर्षों पुरानी तैनाती के साथ जोड़कर देखे जा रहे हैं। हालांकि इन दावों और निर्देशों की आधिकारिक प्रति तथा वर्तमान स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि किया जाना आवश्यक है।
सवाल तटबंध से आगे, तैनाती की प्रक्रिया पर भी
एपी तटबंध टूटने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विभाग ने संवेदनशील तटबंधों की निगरानी के लिए निर्धारित मानकों और शासन के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया?
यदि महेश कुमार सिंह की फील्ड तैनाती को लेकर शासन स्तर पर कोई स्पष्ट रोक या प्रतिबंध था, तो फिर कुशीनगर में उनकी तैनाती किस आदेश के आधार पर जारी रही? क्या शासन से कोई अनुमति या अपवाद लिया गया था? क्या विभागीय स्तर पर समय-समय पर तटबंधों का तकनीकी निरीक्षण हुआ? और यदि हुआ तो उसकी रिपोर्ट में क्या स्थिति दर्ज की गई?
इन सवालों का जवाब विभागीय अभिलेखों और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।

फिलहाल एपी तटबंध की टूट ने सिर्फ पानी का रास्ता नहीं खोला है, बल्कि बाढ़ खंड की वर्षों पुरानी तैनाती व्यवस्था और निगरानी प्रणाली से जुड़े सवालों की फाइल भी खोल दी है। अब निगाहें शासन और सिंचाई विभाग पर हैं कि तटबंध टूटने की तकनीकी जांच के साथ-साथ संबंधित अधिकारियों की तैनाती और जिम्मेदारी की भी निष्पक्ष पड़ताल होती है या नहीं।
