
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता
दिनांक: 03 अक्टूबर 2026
कुशीनगर। किसानों के खेतों तक सिंचाई का पानी पहुंचाने वाली मुख्य पश्चिमी गंडक नहर में किमी 73 के पास आरसीसी पैनल का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होने से निर्माण की गुणवत्ता और विभागीय निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वाल्मीकिनगर बैराज से महराजगंज होते हुए कुशीनगर और आगे बिहार तक जाने वाली इस महत्वपूर्ण नहर के करीब 75 से 80 मीटर हिस्से के टूटने की सूचना है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक क्षतिग्रस्त पैनल का निर्माण लगभग पांच माह पहले कराया गया था। दावा है कि जून में नहर में पानी छोड़े जाने के बाद ही पैनल में जगह-जगह दरारें दिखाई देने लगी थीं। ग्रामीणों का आरोप है कि समय रहते इन शिकायतों को गंभीरता से लेकर तकनीकी जांच कराने के बजाय दरारों को मामूली मरम्मत से संभालने का प्रयास किया गया। अब बड़े हिस्से के ध्वस्त होने के बाद वही दरारें निर्माण की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल बनकर सामने खड़ी हैं।
दरारें थीं चेतावनी, लेकिन जांच कहां हुई?
ग्रामीणों का कहना है कि यदि शुरुआती दौर में ही पैनल की मजबूती, कंक्रीट की गुणवत्ता और निर्माण की तकनीकी प्रक्रिया की जांच करा ली जाती तो नुकसान को बढ़ने से रोका जा सकता था। लेकिन कथित तौर पर ऐसा नहीं हुआ। नतीजा यह है कि नहर का लंबा हिस्सा टूट गया और अब पानी के रिसाव तथा किनारे की मिट्टी के कटाव का खतरा भी बढ़ गया है।
फिलहाल क्षतिग्रस्त हिस्से को संभालने के लिए मिट्टी से भरे बोरों सहित वैकल्पिक सुरक्षा उपाय किए जाने की बात सामने आ रही है। हालांकि ग्रामीणों का सवाल है कि अस्थायी व्यवस्था कब तक टिकेगी और स्थायी समाधान कब होगा?
सिर्फ किमी 73 ही क्यों? आसपास भी चिंता
ग्रामीणों के अनुसार ढोलहां, कोटवा, नंदन छपरा, मुसहरी, सौरहा बुजुर्ग, कोहरगड्डी, खजुरी बाजार, बरवा रतनपुर, गड़हिया बसंतपुर, बंधु छपरा और बिहारी छपरा सहित कई क्षेत्रों में नहर के पैनल की स्थिति को लेकर चिंता बनी हुई है।
यह नहर हजारों किसानों की सिंचाई व्यवस्था से जुड़ी है। ऐसे में एक बड़े हिस्से के अचानक क्षतिग्रस्त होने का असर केवल नहर तक सीमित नहीं माना जा सकता।
अब असली सवाल—मरम्मत होगी या जांच भी?
ग्रामीणों की मांग है कि क्षतिग्रस्त हिस्से पर केवल नया कंक्रीट डालकर मामला समाप्त न किया जाए। निर्माण की तकनीकी जांच, कंक्रीट की गुणवत्ता, निर्धारित मोटाई, सामग्री के मिश्रण, बेस की तैयारी और निर्माण मानकों का परीक्षण कराया जाए।
इसके साथ ही संबंधित कार्य की माप पुस्तिका, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट और निर्माण से जुड़े अभिलेखों की भी जांच की मांग उठ रही है। यदि जांच में निर्माण संबंधी कमी सामने आती है तो जिम्मेदारी भी निर्धारित किए जाने की मांग की जा रही है।
पुरानी घटनाओं से भी नहीं लिया सबक?
मुख्य पश्चिमी गंडक नहर में टूट-फूट की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं। वर्ष 2019 में दुदही क्षेत्र में नहर टूटने से पानी गांवों में पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई थी। नवंबर 2020 में खड्डा क्षेत्र के गैनही जंगल के समीप भी पैनल क्षतिग्रस्त होने की जानकारी सामने आई थी।
ऐसे में किमी 73 की घटना ने पुराने सवालों को फिर जिंदा कर दिया है—क्या हर बार पैनल टूटने के बाद सिर्फ मरम्मत ही समाधान है? निर्माण की गुणवत्ता की स्थायी निगरानी कौन करेगा? और यदि कुछ महीने में ही नया निर्माण जवाब दे जाए तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
दरारों से ध्वंस तक पहुंचा मामला
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि पैनल में पानी छोड़े जाने के कुछ समय बाद ही दरारें दिखाई दे रही थीं तो उस समय विभागीय स्तर पर क्या कार्रवाई की गई? क्या मौके का तकनीकी निरीक्षण हुआ? क्या कंक्रीट के नमूने लिए गए? क्या गुणवत्ता परीक्षण कराया गया?
दरारें अगर शुरुआती चेतावनी थीं, तो फिर उन्हें गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया?
अब गेंद सिंचाई विभाग के पाले में है। देखना यह होगा कि विभाग इस घटना को महज एक क्षतिग्रस्त पैनल की मरम्मत तक सीमित रखता है या फिर निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था की भी निष्पक्ष तकनीकी जांच कराकर जिम्मेदारी तय करने की दिशा में कदम बढ़ाता है।
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता।
