
छह सदस्यीय जांच टीम की आख्या से सरकारी जमीन, करोड़ों की वसूली और राजस्व अभिलेखों पर उठे सवाल
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता।
कुशीनगर। कप्तानगंज चीनी मिल की जमीन का मामला अब सरकारी संपत्ति की सुरक्षा, करोड़ों रुपये की राजस्व वसूली और राजस्व अभिलेखों की शुद्धता जैसे गंभीर सवालों के केंद्र में है। छह सदस्यीय जांच टीम की 19 अगस्त 2026 की आख्या ने जमीन के हस्तांतरण से लेकर कुर्की, भारमुक्ति और मिल परिसर में मौजूद सरकारी भूमि की स्थिति तक कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने रखा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मिल की बाउंड्री के भीतर लगभग 1.32 हेक्टेयर बंजर भूमि मौजूद है, तो उसकी वास्तविक स्थिति क्या है और उसे लेकर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

सरकारी जमीन मिल परिसर के भीतर, कब्जे का मामला कब सुलझेगा?
नगर पंचायत कप्तानगंज के वार्ड नंबर दो निवासी रामनरेश अग्रहरी की शिकायतों पर जिलाधिकारी के 10 अप्रैल 2026 के कार्यालय आदेश से छह सदस्यीय जांच टीम गठित की गई थी। इसमें अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व), सहायक महानिरीक्षक निबंधन, हाटा एवं कप्तानगंज के उपजिलाधिकारी, जिला शासकीय अधिवक्ता (राजस्व) और जिला गन्ना अधिकारी शामिल थे।
जांच के प्रमुख बिंदुओं में जमीन हस्तांतरण का आधार, कुर्की एवं बंधक की स्थिति तथा मिल परिसर में मौजूद बंजर, आबादी और राजकीय भूमि का विवरण शामिल था। रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों के बाद सरकारी जमीन की पहचान, उसके दर्ज स्वामित्व और वास्तविक कब्जे की स्थिति स्पष्ट करना प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। सवाल यह भी है कि यदि बंजर भूमि पर कब्जे की पुष्टि होती है, तो उसे नियमानुसार कब्जामुक्त कराने के लिए क्या कदम उठाए गए?

3.85 करोड़ की वसूली के लिए कुर्की, फिर भारमुक्ति
जांच आख्या के अनुसार, जेआर ऑर्गेनिक्स लिमिटेड, इकाई कप्तानगंज/सोमैया ऑर्गेनिक्स इंडिया लिमिटेड के नाम दर्ज नौ गाटा संख्याओं की जमीन को 18 जनवरी 2016 को तत्कालीन उपजिलाधिकारी कप्तानगंज ने कुर्क किया था। इसकी वजह 3,85,23,994 रुपये और अन्य देयों का भुगतान नहीं होना बताया गया।
इसके बाद 22 दिसंबर 2023 को संबंधित भूमि को भारमुक्त करने का आदेश जारी हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया में अभिलेखीय विसंगति सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक, गाटा संख्या 780क और 1294क को भारमुक्त किए जाने के बावजूद खतौनी में इसकी प्रविष्टि दर्ज नहीं हो सकी थी। त्रुटि सुधारने के लिए तहसीलदार को पत्र भेजे जाने का उल्लेख भी जांच आख्या में है।

यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही की दृष्टि से अहम है। करोड़ों रुपये की वसूली से जुड़े प्रकरण में कुर्की और भारमुक्ति के आदेशों का राजस्व अभिलेखों में सही और समयबद्ध अंकन जरूरी है। हालांकि, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इस चूक को जानबूझकर की गई गड़बड़ी या भ्रष्टाचार करार देना उचित नहीं होगा। इसकी परिस्थितियों और जिम्मेदारी का निर्धारण अभिलेखों की विस्तृत जांच से ही हो सकता है।
1970 के जमीन हस्तांतरण से 2025 के अनुबंध तक
जमीन के स्वामित्व और हस्तांतरण को लेकर भी जांच रिपोर्ट में महत्वपूर्ण विवरण दर्ज हैं। उपनिबंधक हाटा की आख्या के अनुसार, 16 सितंबर 1970 को शंकर डिस्टलरी एंड केमिकल वर्क्स लिमिटेड के पक्ष में 28.67 एकड़ भूमि से संबंधित विक्रय विलेख पंजीकृत हुआ था। इसमें गोदावरी शुगर मिल्स लिमिटेड को भूमि हस्तांतरित करने की अनुमति का उल्लेख बताया गया है।
रिपोर्ट में गोदावरी शुगर मिल्स लिमिटेड से सोमैया ऑर्गेनिक्स लिमिटेड के पक्ष में विक्रय विलेख 8 नवंबर 1968 को पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किए जाने और स्टांप शुल्क की कमी के कारण मामला तत्कालीन देवरिया के स्टांप प्राधिकारी के पास भेजे जाने का विवरण भी है। बाद में यह विलेख 16 जून 1994 को पंजीकृत हुआ।
वहीं, उपनिबंधक कप्तानगंज की रिपोर्ट में 19 अप्रैल 2022 को जेआर ऑर्गेनिक्स लिमिटेड और ए. इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के बीच विक्रय अनुबंध तथा 15 अप्रैल 2025 को उसकी अवधि बढ़ाने संबंधी विलेख के पंजीकरण का उल्लेख है।
अब प्रशासन से सीधे सवाल
कप्तानगंज चीनी मिल की जमीन से जुड़े इस पूरे प्रकरण में अब सबसे जरूरी है कि सरकारी और निजी भूमि की सीमाएं स्पष्ट हों, बंजर भूमि की स्थिति की मौके पर जांच हो और कुर्की एवं भारमुक्ति के आदेशों के अनुरूप राजस्व अभिलेखों का सत्यापन किया जाए।

आखिर सरकारी बंजर भूमि की स्थिति स्पष्ट करने, कथित कब्जे की जांच कराने और अभिलेखीय विसंगतियों को दूर करने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं? इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों की आधिकारिक कार्रवाई और दस्तावेजों से ही सामने आएगा। मामले में संबंधित कंपनी और जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष सामने आने पर खबर को और संतुलित रूप दिया जा सकता है।
