
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। पडरौना विकास खंड की ग्राम पंचायत भिसवा लाला इन दिनों सरकारी पट्टे की जमीन और सरकारी राशन की दुकान के आवंटन को लेकर उठ रहे सवालों के कारण चर्चा में है। ग्रामीणों ने ग्राम प्रधान रफीक की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाते हुए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। ग्रामीणों के दावों ने राजस्व व्यवस्था से लेकर पंचायत स्तर की कार्यप्रणाली तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी पट्टे की जमीन के आवंटन में प्रधान के परिवार से जुड़े लोगों को कथित रूप से लाभ पहुंचाया गया। ग्रामीणों के अनुसार प्रधान के पिता और भाई के नाम पट्टा होने की बात सामने आई है। वहीं, प्रधान के भाई की पत्नी के नाम सरकारी राशन की दुकान आवंटित होने के दावे ने भी मामले को और गंभीर बना दिया है।
सरकारी जमीन पर किसका हक?
ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी भूमि का पट्टा गरीब, भूमिहीन और पात्र लोगों को राहत देने के उद्देश्य से किया जाता है। ऐसे में यदि प्रभावशाली लोगों के परिवार तक इसका लाभ पहुंचा है तो पट्टा आवंटन की पूरी प्रक्रिया की जांच जरूरी है।
ग्रामीणों ने दावा किया कि कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके नाम पट्टा स्वीकृत होने के बावजूद वे अपनी आवंटित भूमि पर वास्तविक कब्जा नहीं ले पा रहे हैं। आरोप यह भी है कि विरोध या शिकायत करने वालों पर दबाव बनाने का प्रयास किया जाता है। कुछ ग्रामीणों ने जमीन पर कब्जे के संबंध में कथित रूप से धन की मांग किए जाने के आरोप भी लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
सोहरौना में प्रधान के नाम पट्टे का दावा
मामला भिसवा लाला तक सीमित नहीं रहने का दावा भी ग्रामीणों ने किया है। उनका आरोप है कि पडरौना क्षेत्र के सोहरौना गांव में भी ग्राम प्रधान रफीक के नाम पट्टा होने की बात सामने आई है।
अब सवाल यह है कि यदि उक्त भूमि का पट्टा हुआ है तो भूमि की श्रेणी क्या थी? आवंटन के समय पात्रता की क्या स्थिति थी? किस सक्षम अधिकारी ने प्रक्रिया पूरी की और किन अभिलेखों के आधार पर स्वीकृति दी गई? इन सवालों का अंतिम जवाब राजस्व अभिलेखों और सक्षम अधिकारी की जांच से ही सामने आ सकता है।
लेखपाल और पंचायत सचिव की रिपोर्ट पर भी सवाल
ग्रामीणों ने स्थानीय लेखपाल और ग्राम पंचायत सचिव की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि शिकायतों के बाद तैयार की गई रिपोर्टों में मौके की वास्तविक स्थिति का सही उल्लेख नहीं किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि यदि शिकायतों की जांच उन्हीं स्तरों पर होती रही जिनकी निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, तो निष्पक्ष परिणाम को लेकर संदेह स्वाभाविक है।
यदि जांच में रिपोर्टों में तथ्य छिपाने या गलत तथ्य प्रस्तुत करने की पुष्टि होती है तो मामला केवल ग्राम प्रधान तक सीमित न रहकर संबंधित कर्मचारियों की भूमिका तक भी पहुंच सकता है।
कोटे की दुकान ने बढ़ाई चर्चा
प्रधान के भाई की पत्नी के नाम सरकारी राशन की दुकान आवंटित होने के दावे ने भी ग्रामीणों के बीच चर्चा तेज कर दी है। ग्रामीणों का सवाल है कि राशन दुकान के चयन में पात्रता, चयन प्रक्रिया और नियमों का पालन किस प्रकार हुआ? क्या आवेदन करने वाले अन्य अभ्यर्थियों की पात्रता की भी समान रूप से जांच की गई थी?इन सवालों का जवाब संबंधित विभागीय अभिलेखों की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
डीएम-सीडीओ से जांच की मांग
ग्रामीणों ने मामले में केवल कागजी रिपोर्ट के बजाय मौके पर पैमाइश, पुरानी और वर्तमान खतौनियों की जांच, पट्टा आवंटन की मूल पत्रावलियों का परीक्षण, कब्जे की वास्तविक स्थिति का सत्यापन तथा राशन दुकान आवंटन की पूरी प्रक्रिया की जांच कराने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि लगाए गए आरोप निराधार हैं तो निष्पक्ष जांच से स्थिति साफ हो जाएगी, लेकिन यदि सरकारी जमीन या पंचायत व्यवस्था के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।अब देखना यह है कि प्रशासन ग्रामीणों द्वारा उठाए गए इन सवालों को कितनी गंभीरता से लेता है और जांच के बाद सरकारी अभिलेख क्या तस्वीर सामने रखते हैं।
नोट—ग्राम प्रधान रफीक से जुड़े अन्य आरोपों और ग्रामीणों द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले दस्तावेजों पर हमारी पड़ताल अगले अंक में जारी रहेगी।
