
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। तहसीलों में वर्षों से चल रही “फाइलों की सुस्ती” पर अब न्यायपालिका का डंडा साफ दिखाई देने लगा है। High Court of Judicature at Allahabad ने WRIT-C संख्या 14461/2026 की सुनवाई में ऐसा सख्त रुख अपनाया कि तमकुहीराज तहसील के जिम्मेदार अधिकारी सीधे सवालों के घेरे में आ गए। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि एक सप्ताह के भीतर पूरी जानकारी और जवाब प्रस्तुत किया जाए, अन्यथा उपजिलाधिकारी (SDM) को स्वयं न्यायालय में उपस्थित होकर रिकॉर्ड सहित जवाब देना होगा।
मामला कोई नया नहीं, बल्कि वही पुराना सरकारी ढर्रा है—आवेदन घूमते रहते हैं, फाइलें धूल फांकती रहती हैं और फरियादी चक्कर काटते-काटते थक जाता है। लेकिन जब वही मामला अदालत के दरवाजे पर पहुंचता है, तो अचानक “गंभीरता” जाग जाती है। सवाल उठता है कि क्या प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए हमेशा न्यायालय की लाठी की जरूरत पड़ेगी?
कटाक्ष यह है कि आम नागरिक जब तहसील पहुंचता है तो उसे घंटों लाइन में खड़ा रखा जाता है, बाबू से लेकर अधिकारी तक “आज नहीं, कल आना” का रटा-रटाया जवाब देते हैं। वहीं, जब अदालत एक हफ्ते का समय देती है, तो वही एक सप्ताह अधिकारियों के लिए चुनौती बन जाता है। यह विरोधाभास बताता है कि सिस्टम में कहीं न कहीं जवाबदेही की कमी गहराई तक पैठ बना चुकी है।
अदालत का यह आदेश केवल एक एसडीएम या एक तहसील तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे के लिए चेतावनी है। यह संदेश साफ है कि अब “फाइल दबाकर रखने” की संस्कृति ज्यादा दिन नहीं चलेगी। यदि तय समय में जवाब नहीं दिया गया, तो अधिकारी को खुद अदालत में उपस्थित होकर जवाब देना होगा—और यही वह स्थिति है जिससे हर जिम्मेदार कुर्सी बचना चाहती है।
स्थानीय लोगों में इस आदेश को लेकर चर्चा तेज है। लोगों का मानना है कि यदि इसी तरह न्यायालय हर मामले में सख्ती दिखाए, तो वर्षों से लंबित मामलों का अंबार अपने आप कम हो सकता है। वहीं, कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि “अदालत का डर ही सही, कम से कम काम तो होगा।”
अब निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं। देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन समय पर जवाब देकर अपनी जिम्मेदारी निभाता है या फिर अदालत में हाजिरी लगाकर अपनी कार्यप्रणाली पर सवालों का सामना करता है। फिलहाल इतना तय है कि इस बार “चुप्पी” नहीं चलेगी—जवाब देना ही पड़ेगा।
