
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर
विशेष संवाददाता
कुशीनगर। यदि किसी बुजुर्ग के सिर पर कथित रूप से कुल्हाड़ी से जानलेवा हमला हो, वह तीन माह से अस्पताल में कोमा की हालत में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा हो, घटना का वीडियो होने का दावा किया जा रहा हो और मुख्य नामजद आरोपी अब भी खुलेआम घूम रहा हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर न्याय की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? कोतवाली पडरौना क्षेत्र के जंगल अमवा गांव में 15 अप्रैल 2026 को हुए चर्चित हमले ने पुलिस की कार्यप्रणाली और विवेचना की निष्पक्षता को लेकर गंभीर चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
पीड़ित पक्ष के अनुसार, घटना के दौरान बुजुर्ग मुंसरीम के सिर पर कथित रूप से कुल्हाड़ी से वार किया गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल होकर कोमा में चले गए। परिवार का कहना है कि तीन माह बीत जाने के बावजूद उनकी हालत में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है और वे अब भी जीवन की जंग लड़ रहे हैं। आरोप है कि मुख्य आरोपी उमर फारूक ने जान से मारने की नीयत से हमला किया, जबकि अन्य लोगों ने भी लाठी-डंडों से प्रहार किया। इसके बावजूद पीड़ित परिवार का दावा है कि मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी अब तक नहीं हुई और सभी आरोपियों पर समान रूप से गंभीर धाराएं भी लागू नहीं की गईं।

मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब पीड़ित अफजल अंसारी ने पुलिस अधीक्षक को शिकायती पत्र देकर विवेचना पर गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि विवेचक निष्पक्ष जांच करने के बजाय विपक्षी पक्ष को लाभ पहुंचाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। शिकायत में यह भी कहा गया है कि घटना का वीडियो फुटेज उपलब्ध होने के बावजूद जांच की गति और दिशा संदेह के घेरे में है। यदि वीडियो और अन्य साक्ष्य मौजूद हैं, तो मुख्य आरोपी अब तक कानून की गिरफ्त से बाहर क्यों है—यह प्रश्न अब गांव से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक चर्चा का विषय बन गया है।
ग्रामीणों के बीच भी इस मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। लोगों का कहना है कि यदि किसी सामान्य व्यक्ति पर ऐसे गंभीर आरोप होते तो क्या वह महीनों तक खुलेआम घूमता रहता? यही सवाल अब पुलिस की निष्पक्षता पर उठ रहे हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
पीड़ित परिवार का यह भी आरोप है कि हमले में शामिल अन्य लोग लगातार उन्हें धमका रहे हैं, जिससे पूरा परिवार भय और असुरक्षा के माहौल में जीने को विवश है। उनका कहना है कि अब तक उन्हें प्रभावी सुरक्षा और ठोस कानूनी कार्रवाई का भरोसा नहीं मिल सका है। इसी कारण उन्होंने मामले की विवेचना को कोतवाली पडरौना से हटाकर किसी अन्य थाने अथवा स्वतंत्र एजेंसी से कराए जाने की मांग की है।
परिजनों का कहना है कि मुकदमे में कुछ आरोपियों के विरुद्ध धारा 109 बीएनएस जोड़ी गई है, लेकिन जिन लोगों पर जानलेवा हमला करने का आरोप है, उन सभी के विरुद्ध समान रूप से कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। उनका आरोप है कि विवेचना में चयनात्मक रवैया अपनाया जा रहा है, जिससे न्याय प्रभावित हो सकता है।
यह मामला अब केवल एक आपराधिक घटना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि निष्पक्ष जांच, कानून के समान अनुपालन और पीड़ित को न्याय मिलने के अधिकार से भी जुड़ गया है। यदि पीड़ित पक्ष के आरोप सही हैं तो यह जांच प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। वहीं यदि आरोप तथ्यहीन हैं, तो निष्पक्ष और पारदर्शी विवेचना से स्थिति स्पष्ट होना भी उतना ही आवश्यक है।

अब सभी की निगाहें जनपद के पुलिस अधीक्षक पर टिकी हैं। यह अपेक्षा की जा रही है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी, विवेचना की समीक्षा होगी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। तीन माह से कोमा में पड़े एक बुजुर्ग और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे उनके परिवार की निगाहें अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस संवेदनशील मामले में पुलिस आगे क्या कदम उठाती है और क्या पीड़ित परिवार को समयबद्ध एवं निष्पक्ष न्याय मिल पाता है।
