
कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर में इन दिनों औचक निरीक्षण को लेकर मचा घमासान अब महज एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसने पालिका की कार्यप्रणाली, विकास कार्यों की पारदर्शिता और सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर उठते पुराने सवालों को फिर से केंद्र में ला दिया है। सवाल सीधा है—अगर नगर पालिका का कामकाज पूरी तरह नियम-कायदे, पारदर्शिता और जवाबदेही के दायरे में चल रहा है, तो प्रशासनिक निरीक्षण के बाद इतनी बेचैनी क्यों दिखाई दी? और निरीक्षण के तथ्यों का जवाब देने से पहले निरीक्षण की वैधानिकता को चुनौती देने की जरूरत क्यों पड़ी?
नगर पालिका कार्यालय में एसडीएम के औचक निरीक्षण के बाद नपाध्यक्ष किरन जायसवाल की ओर से नोटिस जारी किए जाने से विवाद और गहरा गया है। निरीक्षण के अधिकार और अधिकार क्षेत्र को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, निरीक्षण की वैधानिकता का अंतिम निर्णय सक्षम स्तर पर होना अलग विषय है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने जनता के सामने कई असहज सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल—निरीक्षण से परेशानी क्यों?
नगर पालिका जनता के टैक्स और सरकारी धन से चलने वाली संस्था है। यहां होने वाले विकास कार्यों से लेकर कार्यालयीय अभिलेख, निर्माण कार्य, भुगतान, कर्मचारियों की उपस्थिति और प्रशासनिक व्यवस्था तक हर पहलू में पारदर्शिता अपेक्षित है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी द्वारा अभिलेखों और पंजिकाओं का निरीक्षण किया गया, तो सामान्य स्थिति में पालिका को तथ्यों और दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

लेकिन यहां मामला निरीक्षण के बाद सीधे अधिकारों की बहस तक पहुंच गया। यही वह बिंदु है जिसने सवालों को और धार दे दी है। आखिर पालिका के रिकॉर्ड में ऐसा क्या है जिसे लेकर सार्वजनिक जांच की मांग उठ रही है? क्या विकास कार्यों से संबंधित हर फाइल, हर भुगतान और हर अभिलेख बिना किसी संदेह के जांच की कसौटी पर खरा उतर सकता है?
करोड़ों के विकास कार्य, लेकिन हिसाब-किताब पर सवाल
नगर में सड़क, नाली, इंटरलॉकिंग, जल निकासी, सौंदर्यीकरण और अन्य निर्माण कार्यों पर सरकारी धन खर्च होता है। जनता को अधिकार है कि वह पूछे—कितना बजट आया? किस योजना के तहत आया? किस कार्य पर कितना खर्च हुआ? किस एजेंसी या ठेकेदार को काम मिला? टेंडर प्रक्रिया क्या रही? काम की गुणवत्ता किसने परखी? भुगतान किस आधार पर किया गया? और यदि कहीं शिकायत हुई तो जांच में क्या सामने आया?
इन सवालों का जवाब किसी बयान या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि अभिलेखों से मिलना चाहिए।
यही कारण है कि औचक निरीक्षण के बाद पैदा हुआ विवाद अब व्यापक जांच की मांग कर रहा है। यदि शिकायतें निराधार हैं तो दस्तावेज सामने रखकर उन्हें खारिज किया जा सकता है। यदि कार्य नियमानुसार हुए हैं तो जांच से पालिका की पारदर्शिता और मजबूत ही होगी। लेकिन यदि कहीं अनियमितता है तो उसकी जिम्मेदारी तय होना भी उतना ही जरूरी है।
ईओ की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में
नगर पालिका की प्रशासनिक व्यवस्था में अधिशासी अधिकारी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। कार्यालय संचालन, अभिलेखीय व्यवस्था, कर्मचारियों पर प्रशासनिक नियंत्रण और विकास कार्यों से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं में ईओ की जवाबदेही बनती है। ऐसे में कर्मचारियों की कथित मनमानी, कार्यालयीय अव्यवस्था या अधिकारियों की अनुपस्थिति को लेकर यदि शिकायतें सामने आती हैं, तो उनका तथ्यात्मक परीक्षण होना चाहिए।
जनता यह जानना चाहती है कि नगर पालिका में प्रशासनिक नियंत्रण किस स्तर पर है? यदि व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त है तो शिकायतें बार-बार क्यों सामने आ रही हैं? और यदि शिकायतें गलत हैं तो उनके खंडन में ठोस दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?
अधिकार बनाम जवाबदेही—कौन जीतेगा?
इस पूरे प्रकरण को केवल नपाध्यक्ष बनाम एसडीएम का विवाद बना देना असली मुद्दे को छोटा कर देगा। असली मुद्दा नगर पालिका की कार्यप्रणाली और जनता के पैसे का हिसाब है। निरीक्षण का अधिकार किसके पास है, यह कानून और शासनादेशों के आधार पर तय होना चाहिए; लेकिन उसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच किसी दबाव, राजनीतिक प्रभाव या प्रशासनिक टकराव के बिना हो।
जनता को यह भरोसा चाहिए कि शिकायत होगी तो जांच होगी, जांच होगी तो निष्कर्ष सामने आएगा और यदि गड़बड़ी मिलेगी तो जिम्मेदारी भी तय होगी।
अब सवालों का जवाब जरूरी
नगर पालिका विवाद ने एक ऐसा मोड़ ले लिया है जहां केवल नोटिस और जवाब से बात खत्म होने वाली नहीं दिखती। अब जरूरत है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। विकास कार्यों की फाइलें, टेंडर प्रक्रिया, भुगतान अभिलेख, कार्यों की गुणवत्ता
, कर्मचारियों की उपस्थिति और शिकायतों पर हुई कार्रवाई—हर बिंदु की जांच हो।
यदि पालिका का कामकाज पाक-साफ है तो जांच के बाद तस्वीर और साफ होगी। यदि आरोपों में दम नहीं है तो वे स्वतः खारिज हो जाएंगे। लेकिन यदि जांच में अनियमितता सामने आती है तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल किसी एक अधिकारी की प्रतिष्ठा का नहीं, जनता के पैसे और जनता के भरोसे का है।
विलेज फास्ट TIMES, कुशीनगर से विशेष संवाददाता।
