
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर में 20 अगस्त को हुए एसडीएम के औचक निरीक्षण को लेकर अब प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। निरीक्षण के बाद नगर पालिका अध्यक्ष किरन जायसवाल ने जिस तरह सवाल खड़े किए हैं, उससे मामला महज एक नियमित निरीक्षण तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि अधिकार, प्रक्रिया और वैधानिकता के सवाल पर पहुंच गया है।
अध्यक्ष की ओर से भेजे गए पत्र में आरोप लगाया गया है कि 20 अगस्त की सुबह करीब 10:10 बजे
उपजिलाधिकारी, राजस्व विभाग, तहसील कसया द्वारा नगर पालिका कार्यालय का औचक निरीक्षण किया गया। पत्र के अनुसार निरीक्षण के दौरान कार्यालय का मुख्य प्रवेश द्वार करीब डेढ़ घंटे तक बंद रहा। इससे कार्यालय में आने वाले आम नागरिकों, सभासदों और अन्य लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा।लेकिन विवाद का सबसे बड़ा बिंदु दरवाजा बंद रहना नहीं, बल्कि निरीक्षण के दौरान नगर पालिका के विभिन्न कक्षों में पहुंचकर पंजिकाएं और अभिलेख मांगे जाने को लेकर है। अध्यक्ष ने सीधे सवाल उठाया है कि आखिर एसडीएम ने किस अधिकार अथवा किस लिखित आदेश के आधार पर नगरपालिका के अभिलेखों की मांग की?
“मौखिक अधिकार नहीं, लिखित आदेश दिखाइए”
नगर पालिका अध्यक्ष ने अपने पत्र में उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1916 की संबंधित धाराओं का हवाला देते हुए निरीक्षण की वैधानिकता पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि यदि मंडलायुक्त गोरखपुर अथवा किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा एसडीएम को नगर पालिका के निरीक्षण, पंजिकाओं या अभिलेखों की जांच के लिए कोई आदेश अथवा प्राधिकरण-पत्र जारी किया गया था, तो उसकी प्रति नगर पालिका कार्यालय को उपलब्ध कराई जाए।यानी अध्यक्ष का सवाल साफ है—अगर अधिकार था तो आदेश कहां है और अगर आदेश है तो उसकी प्रति नगर पालिका को क्यों नहीं दी गई?अध्यक्ष की ओर से जारी पत्र में अधिनियम की धारा 32 और धारा 17(2) का उल्लेख करते हुए यह तर्क रखा गया है कि नगर पालिका के कार्यों और संचालन के निरीक्षण के लिए निर्धारित वैधानिक प्रावधानों का पालन होना चाहिए। इसी आधार पर अध्यक्ष ने निरीक्षण की प्रक्रिया और अधिकारिता को लेकर आपत्ति दर्ज कराई है।
डेढ़ घंटे बंद रहा मुख्य द्वार, जनता की परेशानी पर भी सवाल
निरीक्षण के दौरान मुख्य प्रवेश द्वार बंद रहने का आरोप भी अब विवाद का अहम हिस्सा बन गया है। नगर पालिका अध्यक्ष के पत्र के मुताबिक करीब डेढ़ घंटे तक प्रवेश द्वार बंद रहने से कार्यालय पहुंचने वाले लोगों को असुविधा हुई।सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि निरीक्षण के दौरान सुरक्षा अथवा प्रशासनिक कारणों से प्रवेश नियंत्रित किया गया था, तो उसकी आवश्यकता और प्रक्रिया क्या थी? क्या इसके लिए कोई लिखित निर्देश था? आखिर जनता से जुड़े कार्यालय में इतने लंबे समय तक मुख्य प्रवेश द्वार बंद रखने का औचित्य क्या था?
हालांकि इन सवालों पर प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
निरीक्षण से निकला नया विवाद—“अभिलेख किस अधिकार से?”
मामला तब और गंभीर हो गया जब अध्यक्ष ने निरीक्षण के दौरान विभिन्न कक्षों में जाकर अधिकारियों-कर्मचारियों से सरकारी पंजिकाएं और अभिलेख मांगे जाने पर सवाल खड़ा किया। नगर पालिका प्रशासन और जिला प्रशासन के बीच अब मूल प्रश्न यही बन गया है कि एसडीएम को नगरपालिका के अभिलेखों की जांच अथवा मांग करने का अधिकार किस आदेश या वैधानिक प्रावधान से मिला था?
दूसरी तरफ, प्रशासनिक अधिकारियों के लिए सरकारी संस्थानों का निरीक्षण व्यवस्था का सामान्य हिस्सा भी हो सकता है। ऐसे में यह पूरा विवाद अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां दोनों पक्षों की वैधानिक स्थिति और प्रक्रिया की स्पष्टता जरूरी हो गई है।
मामला पहुंचा लखनऊ से जिला प्रशासन तक
नगर पालिका अध्यक्ष ने इस मामले को केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रखा है। उनके पत्र की प्रतिलिपि प्रमुख सचिव, नगर विकास विभाग लखनऊ, मंडलायुक्त गोरखपुर, जिलाधिकारी कुशीनगर और अधिशासी अधिकारी नगर पालिका परिषद कुशीनगर को भी भेजी गई है।
इससे संकेत साफ है कि अध्यक्ष निरीक्षण की प्रक्रिया पर उच्च स्तर से स्थिति स्पष्ट कराने के मूड में हैं।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस पत्र का जवाब देकर निरीक्षण का आधार और अधिकार स्पष्ट करेगा? क्या एसडीएम के पास नगरपालिका के अभिलेख मांगने का स्पष्ट वैधानिक अधिकार अथवा सक्षम प्राधिकारी का आदेश था? और यदि ऐसा कोई आदेश मौजूद है तो उसकी प्रति नगर पालिका को उपलब्ध कराई जाएगी?
अब जवाबदेही की बारी
नगर पालिका जैसी स्थानीय संस्था में प्रशासनिक पारदर्शिता और वैधानिक प्रक्रिया दोनों महत्वपूर्ण हैं। यदि निरीक्षण नियमों के तहत हुआ है तो प्रशासन को उसका आधार स्पष्ट करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। वहीं यदि निरीक्षण को लेकर प्रक्रिया संबंधी कोई सवाल है, तो उसका समाधान भी दस्तावेजों और कानून के आधार पर ही होना चाहिए।
फिलहाल 20 अगस्त का निरीक्षण अब नगर पालिका बनाम प्रशासन के अधिकार क्षेत्र की बहस का केंद्र बन चुका है। अध्यक्ष के पत्र ने कई सीधे सवाल प्रशासन के सामने रख दिए हैं—निरीक्षण किस आदेश पर हुआ? अभिलेख किस अधिकार से मांगे गए? मुख्य द्वार डेढ़ घंटे तक क्यों बंद रहा? और निरीक्षण की पूरी प्रक्रिया का वैधानिक आधार क्या था?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही तस्वीर साफ होगी। फिलहाल कुशीनगर की नगर पालिका में निरीक्षण से ज्यादा चर्चा अब निरीक्षण के अधिकार और उसकी प्रक्रिया को लेकर है।
