
कुशीनगर नगर पालिका में ‘प्रतिनिधित्व’ की वैधता पर उठे सवाल, 2012 के शासनादेश ने बढ़ाई गंभीरता
कुशीनगर। मुख्यमंत्री की वर्चुअल बैठक में जब जिले के निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने-अपने निकायों और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, तब कुशीनगर नगर पालिका परिषद की निर्वाचित अध्यक्ष किरन जायसवाल की जगह उनके पति राकेश जायसवाल की मौजूदगी ने प्रशासनिक हलकों में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह नहीं कि राकेश जायसवाल बैठक में दिखाई दिए, सवाल यह है कि वे किस आधिकारिक हैसियत से नगर पालिका का प्रतिनिधित्व कर रहे थे?
बैठक में जिलाधिकारी के साथ सांसद, विधायक, ब्लॉक प्रमुख तथा नगर निकायों के निर्वाचित अध्यक्षों की मौजूदगी बताई जा रही है। ऐसे में कुशीनगर नगर पालिका की निर्वाचित अध्यक्ष के स्थान पर उनके पति की उपस्थिति को लेकर अब लिखित अधिकार, अनुमति और प्रतिनिधित्व की वैधानिकता पर सवाल उठ रहे हैं।

अध्यक्ष की जगह पति—किस आदेश के तहत?
यदि राकेश जायसवाल को नगर पालिका अध्यक्ष की ओर से बैठक में प्रतिनिधित्व के लिए अधिकृत किया गया था तो सबसे अहम सवाल है—अधिकृत किसने किया?
क्या अध्यक्ष की ओर से कोई लिखित प्राधिकरण जारी हुआ था?
क्या जिलास्तर पर इसकी अनुमति दी गई थी?
क्या नगर पालिका के अभिलेख में इसका कोई आदेश मौजूद है?
और यदि कोई लिखित अनुमति नहीं थी तो फिर मुख्यमंत्री की बैठक जैसे सरकारी मंच पर नगर पालिका का प्रतिनिधित्व किस आधार पर किया गया?
यही सवाल अब पूरे मामले का केंद्र बन गया है।
2012 का शासनादेश क्यों बना अहम कड़ी?
मामले को इसलिए भी गंभीरता से देखा जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश नगर विकास विभाग ने 10 अक्टूबर 2012 को शासनादेश संख्या 3905/नौ-1-2012-8ई/1995 जारी किया था। शासन की आधिकारिक वेबसाइट पर इस शासनादेश का विषय स्थानीय नगर निकायों में निर्वाचित महिला पदाधिकारियों के पति अथवा संबंधियों के प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप से संबंधित दर्ज है।
बाद के सरकारी निर्देशों में भी इसी शासनादेश का हवाला देते हुए कहा गया कि निर्वाचित महिला पदाधिकारी अपने कर्तव्यों और दायित्वों का स्वतंत्र रूप से निर्वहन करें तथा अपने स्थान पर या अपने साथ संबंधियों अथवा अन्य व्यक्तियों को निकाय के प्रशासनिक कार्यों में शामिल न करें। यही व्यवस्था पुरुष पदाधिकारियों पर भी लागू होने की बात स्पष्ट की गई है।
मामला सिर्फ एक बैठक का नहीं!
अब चर्चा इस बात की भी है कि यदि निर्वाचित अध्यक्ष स्वयं उपलब्ध थीं, तो उनके स्थान पर पति की मौजूदगी की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि किसी अपरिहार्य कारण से अध्यक्ष उपस्थित नहीं हो सकीं, तो क्या उनके पति को उनकी जगह सरकारी बैठक में बैठने का कोई वैधानिक अधिकार था?
यहां व्यक्तिगत संबंध नहीं, बल्कि संवैधानिक और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न है।
नगर पालिका प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि बैठक में राकेश जायसवाल की मौजूदगी व्यक्तिगत थी या आधिकारिक प्रतिनिधित्व के रूप में। यदि आधिकारिक थी तो उसका आदेश सार्वजनिक होना चाहिए।
तस्वीर से उठे सवाल, अब अभिलेख से चाहिए जवाब
नगर पालिका में राकेश जायसवाल की भूमिका को लेकर पहले से उठते रहे सवालों के बीच मुख्यमंत्री की वर्चुअल बैठक में उनकी मौजूदगी ने बहस को और व्यापक कर दिया है। हालांकि किसी व्यक्ति की मौजूदगी मात्र से नियमों के उल्लंघन का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन प्रतिनिधित्व का आधार और अधिकार स्पष्ट होना जरूरी है।
अब निगाहें नगर पालिका प्रशासन और संबंधित अधिकारियों पर हैं। सवाल सीधा है—अध्यक्ष की जगह पति सरकारी बैठक में किस अधिकार से बैठे?
जवाब मौखिक नहीं, लिखित आदेश और अभिलेखीय साक्ष्य के साथ सामने आना चाहिए।
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता
