
शासनादेश के अनुपालन में दो कर्मचारियों का तबादला, एक को तत्काल कार्यमुक्त किया गया तो दूसरे की कार्यमुक्ति अब तक क्यों अटकी? स्थानांतरण रोकने के अधिकार और आदेश को लेकर उठे सवाल
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय में लंबे समय से एक ही जनपद में तैनात लिपिकों के स्थानांतरण को लेकर शासन के आदेश के अनुपालन पर सवाल खड़े हो गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार स्थानांतरण आदेश के तहत कार्यालय में तैनात रमेश तिवारी का तबादला महराजगंज और सुभाष प्रसाद यादव का स्थानांतरण बलिया किया गया। आरोप है कि रमेश तिवारी को तो आदेश के अनुपालन में तत्काल कार्यमुक्त कर दिया गया, लेकिन सुभाष प्रसाद यादव अब तक कुशीनगर में ही बने हुए हैं।
मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि एक ही स्थानांतरण आदेश के तहत दो कर्मचारियों के साथ अलग-अलग कार्रवाई क्यों हुई, इसका स्पष्ट प्रशासनिक आधार सामने नहीं आया है। यदि सुभाष यादव की कार्यमुक्ति किसी सक्षम अधिकारी के आदेश से रोकी गई है तो उस आदेश की प्रति और उसका वैधानिक आधार भी सार्वजनिक होना चाहिए।
एक रिलीव, दूसरा क्यों रुका?
विभागीय सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि सुभाष यादव की कार्यमुक्ति रोकने अथवा स्थानांतरण पर पुनर्विचार कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शासन के स्थानांतरण आदेश के बाद किसी कर्मचारी को कार्यमुक्त नहीं करने के लिए कोई लिखित अनुमति या स्थगन आदेश जारी हुआ है?
यदि ऐसा कोई आदेश मौजूद है तो उसे सामने लाकर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। वहीं, यदि कोई सक्षम आदेश नहीं है तो कार्यमुक्ति रोकने की प्रशासनिक वजह क्या है—यह सवाल भी जवाब मांग रहा है।
1991 की नियुक्ति से शुरू होता है दूसरा सवाल
सुभाष प्रसाद यादव की सेवा को लेकर भी पुराने अभिलेखों की जांच की मांग उठ रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 1991 में उनकी नियुक्ति तत्कालीन अनौपचारिक शिक्षा परियोजना में कसया विकासखंड क्षेत्र में परिचारक पद पर हुई थी। उस समय कुशीनगर देवरिया जनपद का हिस्सा था। बताया जाता है कि उन्होंने 16 अप्रैल 2001 तक उक्त परियोजना से संबंधित सेवा की।
परियोजना समाप्त होने के बाद उनकी सेवा किस आदेश, किस पद और किस स्वीकृत व्यवस्था के तहत आगे जारी रही—इसकी स्थिति विभागीय अभिलेखों से स्पष्ट होना जरूरी है। संबंधित पूर्व कर्मचारियों के कथित बयानों में भी इस बिंदु पर सवाल उठाए गए हैं।
मूल नियुक्ति से सेवा पुस्तिका तक जांच की जरूरत
सुभाष यादव की नियुक्ति को लेकर रिश्तेदारी और कथित कूटरचित दस्तावेजों से जुड़े आरोप भी लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों की पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है। इसलिए वास्तविक स्थिति जानने के लिए मूल नियुक्ति आदेश, परियोजना समाप्ति संबंधी अभिलेख, सेवा निरंतरता का आदेश, पद स्वीकृति, पदोन्नति संबंधी दस्तावेज और सेवा पुस्तिका की निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण होगी।
डीआईओएस से सीधे सवाल
अब निगाह जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय पर है। सवाल किसी कर्मचारी की व्यक्तिगत निकटता का नहीं, बल्कि शासनादेश के समान रूप से अनुपालन का है।
यदि रमेश तिवारी को स्थानांतरण आदेश के तहत कार्यमुक्त किया गया है तो सुभाष यादव की कार्यमुक्ति क्यों लंबित है? क्या उन्हें रोकने का कोई लिखित आदेश है? यदि है तो किस सक्षम अधिकारी ने जारी किया? और यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है तो शासन के स्थानांतरण आदेश का अनुपालन क्यों नहीं हुआ?
इन सवालों का स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब ही इस पूरे मामले में उठ रही चर्चाओं पर विराम लगा सकता है।
