
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जिले के अंतिम छोर पर बसे तरयासुजान क्षेत्र की जनता आज भी रेलवे प्रशासन की बेरुखी और सरकारी उदासीनता का दंश झेलने को मजबूर है। छपरा-गोमती एक्सप्रेस के ठहराव की मांग वर्षों से उठ रही है, लेकिन रेलवे के जिम्मेदार अफसरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। हालत यह है कि जनता जुलूस निकाल रही है, हस्ताक्षर अभियान चला रही है, जनप्रतिनिधियों के दरवाजे खटखटा रही है, लेकिन रेलवे विभाग मानो “कुंभकर्णी निद्रा” में डूबा पड़ा है।

क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि रेलवे विभाग कागजों में विकास की ट्रेन दौड़ा रहा है, जबकि जमीनी हकीकत में तरयासुजान जैसे इलाके आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। देवरिया सांसद शशांक मणि त्रिपाठी द्वारा स्वयं रेल मंत्रालय को पत्र भेजे जाने के बावजूद छह माह बीत गए, लेकिन नतीजा शून्य रहा। इससे लोगों में भारी नाराजगी और आक्रोश है।
तरयासुजान रेलवे स्टेशन से जुड़े लगभग 40 गांवों के हजारों लोगों के लिए छपरा-गोमती एक्सप्रेस केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि लखनऊ तक पहुंचने की उम्मीद है। मरीजों को इलाज के लिए राजधानी जाना हो, छात्रों को पढ़ाई के लिए सफर करना हो या नौकरीपेशा लोगों को समय से गंतव्य तक पहुंचना हो— सभी के लिए यह ट्रेन किसी जीवनरेखा से कम नहीं मानी जा रही। लेकिन रेलवे प्रशासन की लापरवाही ने लोगों की उम्मीदों को निराशा में बदल दिया है।

ग्रामीणों का कहना है कि जब सांसद तक पत्र लिख चुके हैं और लगातार जनआंदोलन हो रहा है, तब भी कार्रवाई न होना यह साबित करता है कि अफसरशाही आम जनता की समस्याओं को कितनी गंभीरता से ले रही है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ट्रेन के ठहराव के लिए जनता को और कितने ज्ञापन देने होंगे? कितने धरने करने होंगे? और कितनी बार सड़क पर उतरना पड़ेगा?
मोहम्मद वसीम, बैजनाथ उर्फ बेजू, अमित तिवारी, संतोष, दीनानाथ गुप्ता सहित तमाम स्थानीय लोगों ने देवरिया सांसद से मुलाकात कर ट्रेन ठहराव की मांग उठाई थी। समय-समय पर धरना-प्रदर्शन और हस्ताक्षर अभियान भी चलाए गए, लेकिन रेलवे प्रशासन की चुप्पी ने लोगों के गुस्से को और बढ़ा दिया है।
स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। अब क्षेत्र की निगाहें रेल मंत्रालय पर टिकी हैं— देखना यह होगा कि सरकार जनता की जरूरतों को समझती है या फिर तरयासुजान की जनता यूं ही उपेक्षा के प्लेटफॉर्म पर खड़ी रह जाएगी।
