
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर
विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग की ढीली निगरानी और कथित संरक्षण के सहारे अवैध अस्पतालों का ऐसा जाल फैल चुका है, जहां मरीज इलाज के भरोसे पहुंचते हैं, लेकिन लौटते हैं तो कभी कर्ज में, कभी दर्द में और कभी शव बनकर। खिरकिया स्थित “मुन्ना पाली क्लिनिक” पर हुई कार्रवाई ने पूरे जिले में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
बताया जा रहा है कि बेहतर इलाज का सपना दिखाने वाले इस अस्पताल की असलियत तब सामने आई, जब एक प्रसूता की हालत बिगड़ने के बाद परिजनों ने हंगामा शुरू कर दिया। सूचना पर पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों की जांच में अस्पताल में एलोपैथिक पद्धति से कथित अवैध संचालन, मानकों की कमी और कई गंभीर अनियमितताएं सामने आने की बात कही जा रही है। इसके बाद अस्पताल को सील कर दिया गया।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कहानी सिर्फ एक अस्पताल की है? या फिर यह उस बड़े खेल की झलक है, जहां अस्पतालों के नाम बदलते हैं, बोर्ड बदलते हैं, लेकिन आरोप और चेहरे वही रहते हैं?
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, मुन्ना पाली क्लिनिक के संचालक तबरेज आलम पर पहले भी इसी तरह के आरोप लगते रहे हैं। चर्चा है कि अस्पताल कभी “ग्लैक्सी हॉस्पिटल”, कभी “मन्नत हॉस्पिटल” और अब “मुन्ना पाली क्लिनिक” के नाम से चलता रहा। नाम नया, पता नया, लेकिन विवाद पुराने!
सूत्र बताते हैं कि दिसंबर 2024 में खिरकिया-बांसी मार्ग स्थित कथित “मन्नत हॉस्पिटल” में एक प्रसूता के ऑपरेशन के दौरान नवजात की मौत हो गई थी। परिजनों का आरोप था कि अस्पताल प्रबंधन ने घटना को “कुदरत का खेल” बताकर मामला शांत कराने की कोशिश की। दुखद यह कि कुछ दिनों बाद प्रसूता की हालत बिगड़ने पर उसे मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, जहां उसकी भी मौत हो गई। जच्चा-बच्चा दोनों की मौत से आक्रोशित परिजनों ने अस्पताल पहुंचकर हंगामा किया। आरोप है कि मामला बढ़ता देख अस्पताल प्रबंधन ताला लगाकर गायब हो गया।
स्थानीय लोगों का यह भी दावा है कि इससे पहले “ग्लैक्सी हॉस्पिटल” के नाम से संचालित अस्पताल पर भी प्रसूता की मौत के बाद सवाल उठे थे। अगर ये आरोप सही हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर खड़ा होता है।
क्या विभाग की नजर इतनी कमजोर है कि बार-बार नाम बदलकर अस्पताल चलता रहे और किसी को भनक तक न लगे? या फिर जांच की फाइलें भी मरीजों की तरह रेफर होती रहीं?
फिलहाल मुन्ना पाली क्लिनिक सील है, लेकिन जनता पूछ रही है — क्या कार्रवाई यहीं खत्म हो जाएगी? क्या सिर्फ बोर्ड उतरने से “मौत का कारोबार” बंद हो जाएगा? या फिर अवैध अस्पतालों के पूरे नेटवर्क की गहराई तक जांच होगी?
कुशीनगर की जनता जवाब चाहती है, क्योंकि सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहां “इलाज” और “इजाजत” के बीच का फर्क धुंधला होता दिखाई दे रहा है।

