
विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार मामला किसी विकास कार्य की गुणवत्ता या बजट का नहीं, बल्कि सरकारी शिलापट्टों पर अंकित नामों का है। करोड़ों रुपये की लागत से कराए गए विभिन्न विकास कार्यों के शिलापट्टों पर नगर पालिका अध्यक्ष का नाम “किरन राकेश जायसवाल” अंकित किया गया है, जबकि नगर पालिका परिषद के आधिकारिक अभिलेखों, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड, सरकारी पत्राचार तथा अन्य प्रमाणित दस्तावेजों में अध्यक्ष का नाम केवल
“किरन जायसवाल” दर्ज है।
यही अंतर अब पूरे मामले को प्रशासनिक और वैधानिक बहस का विषय बना रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि जब किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की आधिकारिक पहचान सरकारी अभिलेखों से निर्धारित होती है, तब सरकारी शिलापट्टों पर अलग नाम किस नियम, शासनादेश या वैधानिक प्रावधान के आधार पर अंकित कराया गया?
सरकारी शिलापट्ट केवल औपचारिकता नहीं होते, बल्कि वे सार्वजनिक धन से कराए गए कार्यों का स्थायी सरकारी अभिलेख माने जाते हैं। इनमें अंकित प्रत्येक नाम, पद और विवरण भविष्य के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाता है। ऐसे में यदि किसी जनप्रतिनिधि का नाम सरकारी अभिलेखों से भिन्न रूप में लिखा जाता है, तो यह केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और अभिलेखीय शुचिता से जुड़ा गंभीर विषय माना जा सकता है।
ईओ का जवाब—’यह प्रचलन है’, लेकिन नियम कौन-सा?
इस पूरे प्रकरण पर जब नगर पालिका परिषद की अधिशासी अधिकारी अंकिता शुक्ला से पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने स्पष्ट स्वीकार किया कि नगर पालिका के आधिकारिक रिकॉर्ड में अध्यक्ष का नाम “किरन जायसवाल” ही दर्ज है। हालांकि शिलापट्टों पर “किरन राकेश जायसवाल” लिखे जाने के संबंध में उनका कहना था कि “यह प्रचलन है कि हिन्दू महिलाएं अपने नाम के साथ पति का नाम जोड़ती हैं।”
लेकिन जब उनसे पूछा गया कि यदि सरकारी रिकॉर्ड, चुनावी दस्तावेज और अन्य प्रमाणित अभिलेखों में ऐसा नहीं है, तो सरकारी शिलापट्टों पर ऐसा किस शासनादेश, नियमावली या वैधानिक आदेश के तहत किया गया, तो उन्होंने कहा कि “मैं दिखवाती हूं।”
ईओ का यह उत्तर अब स्वयं कई नए सवाल खड़े कर रहा है। प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी कार्य “प्रचलन” से नहीं, बल्कि कानून, नियम, शासनादेश और अधिनियमों के अनुसार संचालित होते हैं। यदि किसी कार्य के पीछे वैधानिक आधार नहीं है, तो केवल परंपरा या सामाजिक प्रचलन का तर्क पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
अध्यक्ष बनने के बाद ही क्यों बदला नाम?
स्थानीय लोगों का कहना है कि अध्यक्ष बनने से पहले उनके आधार कार्ड, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, चुनावी नामांकन पत्र और नगर पालिका के सभी रिकॉर्ड में केवल “किरन जायसवाल” नाम ही प्रयुक्त होता रहा। यदि पति का नाम जोड़ना वास्तव में परंपरा का हिस्सा था, तो यह पहले किसी आधिकारिक दस्तावेज में क्यों नहीं दिखाई दिया? आखिर अध्यक्ष बनने के बाद सरकारी शिलापट्टों पर ही यह बदलाव क्यों किया गया?
यही प्रश्न अब नगर में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोगों का मानना है कि यदि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि का आधिकारिक नाम बदलना था, तो पहले संबंधित अभिलेखों में विधिवत संशोधन कराया जाना चाहिए था। बिना आधिकारिक परिवर्तन के सरकारी शिलापट्टों पर अलग नाम अंकित होना कई शंकाओं को जन्म देता है।
सरकारी रिकॉर्ड बनाम व्यक्तिगत पहचान
प्रशासनिक मामलों के जानकारों का कहना है कि सरकारी शिलापट्ट किसी व्यक्ति की निजी या सामाजिक पहचान का माध्यम नहीं होते। वे सरकारी कार्यों के आधिकारिक दस्तावेज होते हैं। इसलिए उन पर वही नाम अंकित होना चाहिए जो संबंधित व्यक्ति के अधिकृत सरकारी अभिलेखों में दर्ज हो। यदि अलग नाम लिखा जाता है, तो उसके समर्थन में सक्षम प्राधिकारी की अनुमति, शासनादेश या अन्य वैधानिक आधार उपलब्ध होना चाहिए।
अब उठ रहे हैं कई अहम सवाल
पूरा मामला सामने आने के बाद नगर में कई महत्वपूर्ण प्रश्न चर्चा का विषय बने हुए हैं—
क्या सरकारी शिलापट्टों पर आधिकारिक रिकॉर्ड से अलग नाम लिखा जा सकता है?
यदि हां, तो इसका स्पष्ट शासनादेश, नियम या वैधानिक प्रावधान क्या है?
क्या नगर पालिका परिषद ने इस संबंध में कोई प्रस्ताव पारित किया था?
क्या सक्षम अधिकारी से इसकी पूर्व अनुमति प्राप्त की गई थी?
यदि यह केवल “प्रचलन” है, तो क्या भविष्य में कोई भी जनप्रतिनिधि अपनी इच्छा के अनुसार सरकारी शिलापट्टों पर नाम लिखवा सकता है?
यदि यह प्रशासनिक त्रुटि है, तो क्या संबंधित सभी शिलापट्टों में संशोधन कराया जाएगा?
प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी निगाहें
अब निगाहें जिला प्रशासन और नगर विकास विभाग की संभावित कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि इस मामले में कोई वैधानिक आधार उपलब्ध नहीं है, तो संबंधित शिलापट्टों में संशोधन, जिम्मेदारी तय करने और भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं। वहीं यदि किसी नियम के तहत ऐसा किया गया है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना भी आवश्यक माना जा रहा है ताकि भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।
फिलहाल नगर में एक ही सवाल गूंज रहा है—”जब सरकारी अभिलेखों में अध्यक्ष का नाम ‘किरन जायसवाल’ दर्ज है, तो सरकारी शिलापट्टों पर ‘किरन राकेश जायसवाल’ आखिर किस नियम के तहत अंकित कराया गया?”

