
विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर का कामकाज इन दिनों एक ऐसे सवाल के घेरे में है, जिसका जवाब सिर्फ चर्चा से नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है। नगर की सियासी और प्रशासनिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि नगर पालिका की निर्वाचित अध्यक्ष किरन जायसवाल हैं, लेकिन उनके पति राकेश जायसवाल की भूमिका आखिर कितनी है?
नगरवासियों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि यदि जनता ने अध्यक्ष पद के लिए किरन जायसवाल को अपना प्रतिनिधि चुना है तो नगर पालिका के प्रशासनिक एवं विकास कार्यों में राकेश जायसवाल की सक्रियता किस वैधानिक अधिकार के तहत है? क्या अध्यक्ष के पति होने मात्र से किसी व्यक्ति को नगर पालिका के अधिकारियों-कर्मचारियों को निर्देश देने, विकास कार्यों की निगरानी करने अथवा प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित करने का अधिकार मिल जाता है?
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल है—कुर्सी पर किरन हैं तो सिस्टम में राकेश की भूमिका आखिर क्या है?
‘अध्यक्ष पति’ की हनक या महज चर्चा?
नगर पालिका परिषद कोई निजी संस्था नहीं, बल्कि कानून के तहत संचालित स्थानीय निकाय है। यहां जनता से जुड़े फैसले निर्धारित नियमों, निर्वाचित बोर्ड और अधिकृत अधिकारियों के माध्यम से लिए जाते हैं। ऐसे में यदि किसी ऐसे व्यक्ति की भूमिका सामने आती है, जिसके पास नगर पालिका में कोई निर्वाचित अथवा वैधानिक पद नहीं है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े होना लाजिमी है।

नगर में चर्चा है कि अध्यक्ष के पति राकेश जायसवाल नगर पालिका के कामकाज में प्रभाव रखते हैं और अधिकारी-कर्मचारी भी उनकी बात को गंभीरता से लेते हैं। हालांकि इन चर्चाओं की वास्तविकता क्या है, यह जांच का विषय है। लेकिन सवाल इतना गंभीर है कि नगर पालिका प्रशासन को स्वयं स्पष्ट करना चाहिए कि राकेश जायसवाल की आधिकारिक भूमिका क्या है और यदि उन्हें कोई जिम्मेदारी अथवा अधिकार प्राप्त है तो उसका लिखित आदेश कहां है?
अध्यक्ष किरन या ‘अध्यक्ष पति’ राकेश?
जनता ने अपना मत देकर किरन जायसवाल को नगर पालिका अध्यक्ष चुना है। लिहाजा संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारियां भी उन्हीं से जुड़ी हैं। ऐसे में नगरवासियों के बीच यह चर्चा चिंता का विषय बन रही है कि कहीं निर्वाचित अध्यक्ष की भूमिका के समानांतर कोई अनधिकृत व्यवस्था तो नहीं चल रही?
क्या राकेश जायसवाल नगर पालिका अधिकारियों को निर्देश दे सकते हैं? क्या वह सरकारी फाइलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं? क्या विकास कार्यों की गुणवत्ता, भुगतान, निर्माण या प्रशासनिक फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं? क्या वह बोर्ड की बैठकों में अध्यक्ष की ओर से कोई आधिकारिक भूमिका निभा सकते हैं?
यदि इन सवालों का जवाब नहीं है तो फिर अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा उनके निर्देशों को मानने की बात सामने क्यों आती है?
और यदि वास्तव में उन्हें कोई अधिकार प्राप्त है तो नगर पालिका प्रशासन को उसका शासनादेश, आदेश अथवा अधिकृत पत्र सार्वजनिक करना चाहिए।
शिलापट्टों पर ‘किरन राकेश जायसवाल’—नाम को लेकर भी सवाल
मामले का एक और पहलू नगर में लगाए गए विकास कार्यों के शिलापट्टों से जुड़ा बताया जा रहा है। चर्चा है कि कुछ शिलापट्टों पर अध्यक्ष का नाम ‘किरन राकेश जायसवाल’ अंकित किया गया है।

यहां सवाल व्यक्ति विशेष के नाम का नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजी परंपरा और वैधानिक पहचान का है। यदि नगर पालिका के अभिलेखों में निर्वाचित अध्यक्ष का नाम किरन जायसवाल दर्ज है, तो सरकारी विकास कार्यों के शिलापट्ट पर नाम लिखने की स्वीकृत प्रक्रिया क्या है?
क्या अध्यक्ष के नाम के साथ पति का नाम लिखने के लिए कोई निर्धारित सरकारी दिशा-निर्देश हैं? यदि हैं तो वह नियम सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है तो फिर सरकारी शिलापट्टों पर इस तरह नाम अंकित किए जाने की प्रक्रिया की जांच भी जरूरी हो जाती है।
सरकारी धन से विकास, फिर व्यक्तिगत श्रेय क्यों?
नगर पालिका की सड़कें, नालियां, इंटरलॉकिंग, प्रकाश व्यवस्था, पार्क और अन्य विकास कार्य जनता के पैसे से होते हैं। किसी व्यक्ति विशेष की निजी निधि से नहीं। ऐसे में किसी सार्वजनिक कार्य को किसी व्यक्ति विशेष की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किए जाने की धारणा भी सवाल पैदा करती है।
नगरवासियों का कहना है कि सरकारी धन से हुआ विकास जनता का अधिकार और नगर पालिका की जिम्मेदारी है। इसका श्रेय किसे दिया जाए, यह भी पारदर्शी व्यवस्था और नियमों के अनुरूप होना चाहिए।
यदि कहीं विकास कार्यों को लेकर यह प्रचारित हो रहा है कि काम किसी व्यक्ति विशेष ने कराया है, तो नगर पालिका को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कार्य किस योजना से स्वीकृत हुआ, धनराशि किस मद से आई, तकनीकी स्वीकृति किसने दी, भुगतान किस अधिकारी ने किया और कार्यादेश किसके नाम से जारी हुआ।
सीसीटीवी से लेकर फाइलों तक—जांच हुई तो खुल सकता है पूरा खेल
मामले की वास्तविकता सामने लाने के लिए किसी राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा जरूरी है दस्तावेजी जांच। नगर पालिका कार्यालय के सीसीटीवी फुटेज, बोर्ड बैठकों की कार्यवाही, उपस्थिति पंजिका, नोटशीट, पत्रावलियां, विकास कार्यों की फाइलें, भुगतान संबंधी दस्तावेज और अधिकारियों-कर्मचारियों के बयान की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।
यह भी देखा जा सकता है कि अध्यक्ष नगर पालिका कार्यालय में कब-कब उपस्थित रहीं, किन बैठकों में शामिल हुईं और किन मौकों पर उनके पति मौजूद रहे। यदि राकेश जायसवाल ने किसी अधिकारी या कर्मचारी को कोई निर्देश दिया है तो क्या वह लिखित था? यदि मौखिक निर्देश दिए गए तो उनके आधार पर क्या कार्रवाई हुई?
यही दस्तावेज तय करेंगे कि मामला महज चर्चाओं का है या फिर पर्दे के पीछे कोई समानांतर व्यवस्था वास्तव में चल रही थी।
नगर पालिका प्रशासन की अग्निपरीक्षा
अब गेंद नगर पालिका प्रशासन के पाले में है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि राकेश जायसवाल की नगर पालिका में क्या भूमिका है। यदि वे किसी सांसद अथवा अन्य जनप्रतिनिधि के अधिकृत प्रतिनिधि हैं, तो उस प्रतिनिधित्व का लिखित प्रमाण और उसकी वैधानिक सीमा भी स्पष्ट होनी चाहिए।
क्योंकि ‘प्रतिनिधि’ होना और ‘नगर पालिका अध्यक्ष के अधिकारों का प्रयोग करना’ दो अलग-अलग बातें हैं। किसी जनप्रतिनिधि का प्रतिनिधि होने से स्वतः नगर पालिका के प्रशासनिक अधिकार प्राप्त नहीं हो जाते।
इसलिए सवाल अब सिर्फ इतना नहीं रह गया है कि अध्यक्ष किरन जायसवाल हैं या उनके पति राकेश जायसवाल? असली सवाल यह है कि नगर पालिका में निर्णय किस वैधानिक व्यवस्था के तहत लिए जा रहे हैं और उन निर्णयों की जवाबदेही आखिर किसकी है?
नगरवासियों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी व्यक्ति को बिना वैधानिक अधिकार सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप करते पाया जाता है तो जिम्मेदारी तय की जाए।
विलेज फास्ट टाइम्स का सवाल साफ है—जनता ने अध्यक्ष की कुर्सी पर किरन जायसवाल को बैठाया है, तो फिर नगर पालिका के सिस्टम में ‘अध्यक्ष पति’ की भूमिका इतनी प्रभावशाली क्यों दिखाई दे रही है?
इस सवाल का जवाब चर्चाओं से नहीं, शासनादेश, सरकारी अभिलेख और निष्पक्ष जांच से सामने आना चाहिए।
नोट : अगले अंक में पढ़िए—‘किस सांसद के प्रतिनिधि हैं राकेश जायसवाल?’ नगर पालिका के ईओ के अनुसार राकेश जायसवाल सांसद प्रतिनिधि हैं—आखिर किस सांसद के और उनके अधिकारों की सीमा क्या है?
