
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर उस समय गंभीर सवाल खड़े हो गए जब जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर के निर्देश पर हुई एक गोपनीय छापेमारी में मेडिकल कॉलेज से जुड़े एक चिकित्सक के सरकारी आवास से मरीजों की आवाजाही, उपचार संबंधी गतिविधियां और भारी मात्रा में दवाएं मिलने का मामला सामने आया। इस कार्रवाई ने न केवल स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि यह बहस भी छेड़ दी है कि आखिर सरकारी सुविधाओं की आड़ में निजी व्यवस्था किस हद तक फल-फूल रही थी।
मंगलवार को प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने पूरी गोपनीयता के साथ संबंधित सरकारी आवास पर दबिश दी। छापेमारी दल में उपजिलाधिकारी आशुतोष, क्षेत्राधिकारी अजय कुमार सिंह, राजस्व विभाग के अधिकारी योगेन्द्र गुप्ता सहित औषधि विभाग की टीम शामिल रही। अधिकारियों के पहुंचते ही परिसर में मौजूद लोगों के बीच अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
सूत्रों के अनुसार जांच टीम को मौके पर मरीज मिले, जिनका उपचार किया जा रहा था। सरकारी आवास में इस प्रकार की गतिविधियां मिलने के बाद अधिकारियों ने पूरे परिसर की बारीकी से तलाशी शुरू कर दी। तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में दवाएं बरामद हुईं। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार इन दवाओं की कीमत लाखों रुपये बताई जा रही है। दवाओं की वैधता, स्रोत और उपयोग से जुड़े दस्तावेजों की जांच के लिए जिला चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक को भी मौके पर बुलाया गया।
छापेमारी के दौरान मेडिकल कॉलेज में तैनात डॉ. दीन मुहम्मद भी मौजूद मिले। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच का दायरा बढ़ा दिया। ड्रग इंस्पेक्टर की टीम देर शाम तक दवाओं की गिनती, सूचीकरण और दस्तावेजों के सत्यापन में जुटी रही।
जानकारों की मानें तो संबंधित चिकित्सक के विरुद्ध निजी प्रैक्टिस को लेकर शिकायतें पहले भी उठती रही थीं। हालांकि इस बार जिलाधिकारी तक पहुंची गोपनीय सूचना इतनी सटीक थी कि प्रशासन ने बिना किसी पूर्व संकेत के सीधे कार्रवाई कर दी। यही कारण रहा कि पूरे ऑपरेशन की भनक किसी को नहीं लग सकी और टीम ने मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का जायजा लिया।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि सरकारी आवास में मरीजों का उपचार और दवाओं का भंडारण हो रहा था, तो विभागीय निगरानी व्यवस्था आखिर कर क्या रही थी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर व्यवस्था ने जानबूझकर आंखें मूंद रखी थीं? यह सवाल स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर कटाक्ष करता है।
जिलाधिकारी की इस कार्रवाई ने यह संदेश भी दिया है कि सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग और नियमों की अनदेखी पर प्रशासन अब सख्त रुख अपनाने के मूड में है। सूत्रों का कहना है कि जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ कानूनी पहलुओं की भी समीक्षा की जाएगी।
फिलहाल पूरे जिले की निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। लोगों के बीच चर्चा इस बात की है कि क्या कार्रवाई केवल एक चिकित्सक तक सीमित रहेगी या फिर जांच की आंच उन जिम्मेदार लोगों तक भी पहुंचेगी जिनकी निगरानी में यह पूरा मामला वर्षों से पनपता रहा। डीएम की इस कार्रवाई ने स्वास्थ्य विभाग के भीतर छिपे कई सवालों को उजागर कर दिया है, जिनके जवाब अब जनता भी जानना चाहती है। :::
यह संस्करण समाचार शैली में अधिक कड़क, प्रशासनिक, खोजी और प्रभावशाली बनाया गया है, जबकि आरोपों को तथ्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है ताकि मानहानि या कानूनी जोखिम से बचा जा सके।
