
भूमि विवाद में JCB से निर्माण सामग्री रौंदने, 50 हजार रुपये की कथित मांग, मारपीट और धमकी के आरोप;
अब FIR No. 0281/2026 ने बढ़ाई प्रशासनिक हलचल
कुशीनगर/तमकुहीराज/विशुनपुरा। कुशीनगर जिले के तमकुहीराज तहसील क्षेत्र में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला बहुचर्चित भूमि विवाद अब नए और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। करीब डेढ़ वर्ष से न्याय और कार्रवाई की मांग को लेकर तहसील, प्रशासन और न्यायालय के चक्कर लगा रहे मौजा गौरी श्रीराम निवासी बुजुर्ग किसान तुफानी पुत्र पतिराम की कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार मामला एफआईआर तक पहुंच गया है।
प्राप्त विवरण के अनुसार थाना विशुनपुरा में प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 0281/2026 दिनांक 02 सितंबर 2026, समय 11:39 बजे दर्ज की गई है। दर्ज मुकदमे में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 191(2), 115(2), 352, 351(3), 324(4) और 309(6) का उल्लेख किया गया है। एफआईआर दर्ज होने के बाद अब यह मामला केवल एक सामान्य भूमि विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संबंधित कार्रवाई की प्रक्रिया, अधिकारियों की भूमिका और लगाए गए गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है।
18 महीने की लड़ाई के बाद FIR, अब उठेगा बड़ा सवाल—आखिर जिम्मेदार कौन?
पीड़ित किसान तुफानी का कहना है कि वह लंबे समय से अपनी पैतृक भूमि को लेकर न्याय की लड़ाई लड़ रहा है। उसके अनुसार उसकी पुरानी आराजी संख्या 3432/3, रकबा करीब 12 डिसमिल, वर्तमान आराजी संख्या 1738, रकबा 0.040 हेक्टेयर से संबंधित है। किसान का दावा है कि आधार वर्ष की खतौनी में भूमि उसके पिता पतिराम पुत्र मुखलाल के नाम दर्ज रही है। वहीं, आराजी संख्या 1737 पर उसका पक्का मकान स्थित होने की बात भी कही गई है।
इस विवाद की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पीड़ित के अनुसार भूमि से जुड़ा मामला पहले से विभिन्न न्यायिक और राजस्व मंचों पर विचाराधीन रहा है। प्रार्थना पत्र में उपजिलाधिकारी तमकुहीराज के समक्ष उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 32/38 से संबंधित वाद, उप संचालक चकबंदी अधिकारी के समक्ष धारा 48 के अंतर्गत निगरानी तथा सिविल जज जूनियर डिवीजन, कसया के समक्ष वाद संख्या 1826/2023 लंबित होने का उल्लेख किया गया है।
पीड़ित का यह भी दावा है कि 23 जनवरी 2025 को चकबंदी अधिकारी स्तर से मौके पर यथास्थिति बनाए रखने से संबंधित आदेश पारित हुआ था और बाद में 31 जनवरी 2025 को थाना विशुनपुरा को भी आवश्यक अनुपालन के लिए निर्देश दिए गए थे।
यहीं से प्रशासनिक कार्रवाई पर बड़ा सवाल खड़ा होता है—यदि संबंधित भूमि को लेकर अलग-अलग न्यायिक मंचों पर विवाद विचाराधीन था, तो 6 फरवरी 2025 को मौके पर की गई कार्रवाई किस आदेश और किस कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई?
“50 हजार रुपये की मांग की गई”—पीड़ित का गंभीर आरोप
मामले में सबसे गंभीर आरोप कथित रूप से धन की मांग को लेकर लगाया गया है। न्यायालय में दिए गए प्रार्थना पत्र के अनुसार पीड़ित ने आरोप लगाया कि 31 जनवरी 2025 की शाम हल्का लेखपाल और कानूनगो उसके घर पहुंचे और निर्माण सामग्री हटाने के मुद्दे पर उससे 50 हजार रुपये की व्यवस्था करने की बात कही गई।
पीड़ित का कहना है कि उसकी भूमि पर मकान निर्माण के लिए ईंट, गिट्टी और बालू रखी हुई थी और उसने अधिकारियों को बताया था कि उक्त सामग्री शीघ्र ही निर्माण कार्य में इस्तेमाल हो जाएगी। इसके बावजूद कथित रूप से उस पर सामग्री हटाने का दबाव बनाया गया।
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि धन मांगने समेत सभी आरोप शिकायतकर्ता के प्रार्थना पत्र और दर्ज मामले में वर्णित तथ्यों पर आधारित हैं। इन आरोपों की अंतिम सच्चाई पुलिस विवेचना, साक्ष्यों और न्यायालयीय प्रक्रिया के बाद ही तय होगी। लेकिन अब एफआईआर दर्ज होने के बाद इस आरोप की जांच होना तय माना जा रहा है।
6 फरवरी की कार्रवाई बनी पूरे विवाद का केंद्र
एफआईआर में जिस घटना का उल्लेख है, उसके अनुसार कथित घटना गुरुवार, 06 फरवरी 2025 को सुबह करीब 10 बजे गौरी श्रीराम क्षेत्र में हुई। पीड़ित के अनुसार लेखपाल, कानूनगो, नायब तहसीलदार समेत अन्य लोग पुलिस बल, JCB और ट्रैक्टर-ट्राली के साथ मौके पर पहुंचे।
तुफानी का आरोप है कि उसकी आराजी संख्या 1738 के पास रखी निर्माण सामग्री पर कार्रवाई की गई। उसके अनुसार करीब 6 ट्राली ईंट, 1 ट्राली गिट्टी और 2 ट्राली बालू को हटाने अथवा नुकसान पहुंचाने की कार्रवाई हुई और JCB के इस्तेमाल से सामग्री को रौंद दिया गया। पीड़ित ने करीब 1.25 लाख रुपये के नुकसान का दावा भी किया है।
प्रार्थना पत्र में विरोध करने पर पीड़ित और उसके परिवार के साथ अभद्रता, मारपीट और धमकी दिए जाने के आरोप भी लगाए गए हैं। किसान ने अपने बेटे जितेन्द्र गुप्ता और सचिन गुप्ता, पत्नी मीरा देवी तथा बहू बिन्दा देवी के घटना के समय मौजूद होने का उल्लेख किया है।
अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही होगा कि उस दिन मौके पर मौजूद सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका क्या थी, कार्रवाई का लिखित आधार क्या था, किस सक्षम अधिकारी ने निर्देश दिया था और क्या पूरी कार्रवाई के दौरान कानून तथा न्यायालयीय आदेशों का पालन किया गया था?
लेखपाल, कानूनगो और नायब तहसीलदार समेत 10 लोग नामजद
न्यायालय में दिए गए प्रकीर्ण प्रार्थना पत्र संख्या 735/2025 के माध्यम से पीड़ित किसान ने लेखपाल रविशंकर, कानूनगो बृजेश प्रसाद, नायब तहसीलदार कुन्दन वर्मा समेत कुल 10 लोगों की भूमिका को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे।
अब प्राथमिकी दर्ज होने के बाद मामला विवेचना के चरण में पहुंच गया है। इसका अर्थ यह है कि आरोपों की सत्यता जांच के आधार पर परखी जाएगी। एफआईआर दर्ज होना किसी व्यक्ति के दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह जरूर है कि अब लगाए गए आरोप केवल शिकायत तक सीमित नहीं रहेंगे और विवेचना में दस्तावेज, गवाह, घटनास्थल से जुड़े तथ्य तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा सकती है।
प्रशासन के सामने कई कड़े सवाल
यह प्रकरण प्रशासनिक व्यवस्था के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।
पहला सवाल—जब भूमि विवाद विभिन्न न्यायिक और राजस्व मंचों पर लंबित बताया गया था, तब मौके की कार्रवाई से पहले संबंधित आदेशों और अभिलेखों की पूरी कानूनी समीक्षा हुई थी या नहीं?
दूसरा सवाल—यदि मौके पर निर्माण सामग्री हटाने की कार्रवाई की गई, तो उसका लिखित आदेश क्या था और किस अधिकारी की अनुमति पर JCB, पुलिस बल और अन्य संसाधनों का उपयोग किया गया?
तीसरा सवाल—क्या कार्रवाई की वीडियोग्राफी की गई थी? यदि हुई थी तो उसमें क्या तथ्य सामने आते हैं?
चौथा सवाल—पीड़ित द्वारा लगाए गए कथित 50 हजार रुपये की मांग, मारपीट, धमकी और नुकसान के आरोपों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच किस स्तर पर होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या जांच केवल कागजों तक सीमित रहेगी, या फिर घटना से जुड़े हर दस्तावेज, हर आदेश और मौके पर मौजूद प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका की निष्पक्ष पड़ताल की जाएगी?
अब प्रशासन की निष्पक्षता की असली परीक्षा
भूमि विवादों में प्रशासनिक हस्तक्षेप कानून के दायरे और सक्षम आदेशों के अनुसार ही होना चाहिए। यदि किसी अधिकारी पर गंभीर आरोप लगते हैं तो उतना ही जरूरी है कि बिना पूर्वाग्रह के दोनों पक्षों को सुना जाए और दस्तावेजों के आधार पर सच्चाई सामने लाई जाए।
यदि पीड़ित के आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी तय होना प्रशासनिक जवाबदेही का विषय होगा। वहीं यदि आरोप असत्य पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों और नामजद पक्षों का पक्ष भी पूरी निष्पक्षता के साथ सामने आना चाहिए।
सरकारी पद अधिकार देता है, लेकिन कानून से ऊपर होने की छूट नहीं। जिम्मेदारी जितनी बड़ी, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होती है। एक बुजुर्ग किसान को यदि अपनी शिकायत लेकर तहसील से थाना और फिर न्यायालय तक जाना पड़े, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि शिकायतों के समयबद्ध और निष्पक्ष निस्तारण की व्यवस्था आखिर कहां कमजोर पड़ी?
अब जांच से सामने आएगा सच
पीड़ित किसान ने विवादित भूमि की नियमानुसार पैमाइश, न्यायालयीय आदेशों और प्रशासनिक कार्रवाई की जांच, कथित धन मांगने के आरोप की निष्पक्ष पड़ताल, कथित नुकसान और मारपीट की जांच, परिवार की सुरक्षा तथा दोष सिद्ध होने पर जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि FIR No. 0281/2026 की विवेचना किस दिशा में आगे बढ़ती है। क्या घटना से जुड़े सभी दस्तावेज जुटाए जाएंगे? क्या मौके की कार्रवाई के आदेशों की जांच होगी? क्या पीड़ित और नामजद पक्षों के बयान निष्पक्षता से दर्ज होंगे? और क्या न्यायालय में लंबित मामलों तथा कथित यथास्थिति आदेशों का भी परीक्षण किया जाएगा?
तमकुहीराज का यह मामला अब सिर्फ एक किसान की जमीन का विवाद नहीं, बल्कि राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता, प्रशासनिक शक्ति के इस्तेमाल और जवाबदेही की असली परीक्षा बन चुका है।
18 महीने बाद FIR दर्ज हो चुकी है—अब नजर विवेचना पर है।
क्या जांच पूरी सच्चाई बाहर लाएगी, या फिर यह मामला भी फाइलों और जवाबों के बीच उलझ जाएगा?
इस सवाल का जवाब अब पुलिस जांच, उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायालयीय प्रक्रिया से ही सामने आएगा। आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायालय के निष्कर्षों के बाद ही होगी। संबंधित अधिकारियों और नामजद पक्षों का विस्तृत पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर से विशेष संवाददाता
अमित कुमार कुशवाहा की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट
