
करोड़ों की सरकारी परियोजना अधूरी, समयसीमा कब की खत्म; न पार्क हुआ हैंडओवर, न जमा हुआ जुर्माना—सरकारी खामियों के बीच जवाबदेही पर बड़ा सवाल
विशेष संवाददाता, विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर।
कुशीनगर जिला मुख्यालय रवीन्द्र नगर स्थित जिलाधिकारी कार्यालय की दहलीज के सामने बन रहा बुद्धा पार्क अब केवल अधूरे निर्माण का मामला नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी परियोजनाओं की निगरानी, ठेकेदारों की जवाबदेही और विभागीय कार्रवाई की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। करोड़ों रुपये की इस सार्वजनिक परियोजना की निर्धारित समयसीमा बीत चुकी है, पार्क आज भी पूरी तरह तैयार नहीं है, उद्यान विभाग को विधिवत हस्तांतरण नहीं हुआ और कार्य में देरी के कारण कार्यदायी संस्था पर लगाई गई पेनाल्टी भी बढ़ते-बढ़ते 30 लाख रुपये के पार पहुंचने की बात सामने आ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देरी और पेनाल्टी का उल्लेख स्वयं विभागीय अभिलेखों में दर्ज है, तो फिर जुर्माने की वसूली आखिर क्यों नहीं हुई? क्या ठेकेदार के लिए नियम अलग हैं या फिर सरकारी कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है?
15 सितंबर 2025 थी अंतिम तारीख, लेकिन पार्क आज भी अधूरा
परियोजना से संबंधित उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों और जांच आख्या के अनुसार बुद्धा पार्क का निर्माण कार्य 15 सितंबर 2025 तक पूरा कर उद्यान विभाग को हस्तांतरित किया जाना था। मगर तय समय गुजरने के बाद भी निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका। जनता के लिए तैयार की जा रही यह महत्वपूर्ण परियोजना आज भी अधूरेपन की कहानी कह रही है।
आईजीआरएस शिकायत की जांच के दौरान जिला उद्यान अधिकारी और प्रांतीय खंड कसया के अवर अभियंता के संयुक्त हस्ताक्षर से प्रस्तुत आख्या में भी कार्य की समयसीमा और निर्माण में हुई देरी का उल्लेख किया गया। आख्या के अनुसार एमओयू की शर्तों के तहत कार्यदायी संस्था पर उस समय 24.98 लाख रुपये की पेनाल्टी बन चुकी थी।
यानी सरकारी रिकॉर्ड में यह स्थिति स्पष्ट रूप से सामने आई कि निर्माण निर्धारित अवधि में पूरा नहीं हुआ और देरी के लिए आर्थिक दंड देय था। लेकिन सवाल यह है कि जब लगभग 25 लाख रुपये की पेनाल्टी तय हो चुकी थी, तो उसकी वसूली के लिए ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
पेनाल्टी बढ़ती रही, कार्रवाई कहां गई?
निर्माण में देरी आगे भी जारी रही और इसके साथ ही पेनाल्टी की राशि बढ़ती चली गई। अब जुर्माने की रकम 30 लाख रुपये से अधिक पहुंचने की बात सामने आ रही है। आरोप यह है कि इतनी बड़ी धनराशि देय होने के बावजूद संबंधित कार्यदायी संस्था द्वारा पेनाल्टी जमा नहीं की गई।
यहां मामला और गंभीर हो जाता है। एक तरफ सरकारी परियोजना की समयसीमा टूटती रही, दूसरी तरफ आर्थिक दंड बढ़ता रहा और तीसरी तरफ वसूली की कार्रवाई का स्पष्ट परिणाम जनता के सामने नहीं आया।
आखिर यह कैसा तंत्र है, जहां जुर्माना बढ़ता जाता है लेकिन उसकी वसूली नहीं होती?
क्या पेनाल्टी केवल फाइलों में आंकड़ा बढ़ाने के लिए लगाई जा रही है?
यदि वसूली नहीं होनी थी तो फिर करोड़ों की सरकारी परियोजना में अनुबंध की शर्तों और दंडात्मक प्रावधानों का औचित्य क्या रह जाता है?
न काम पूरा, न हैंडओवर, जनता को कब मिलेगा पार्क?
करोड़ों रुपये की इस परियोजना का उद्देश्य आम जनता को बेहतर सार्वजनिक सुविधा उपलब्ध कराना था। लेकिन जब तक निर्माण कार्य पूरा नहीं होगा और पार्क को उद्यान विभाग के सुपुर्द नहीं किया जाएगा, तब तक परियोजना का वास्तविक लाभ जनता को कैसे मिलेगा?
वर्तमान स्थिति को लेकर कई सवाल एक साथ खड़े हैं—पार्क अधूरा क्यों है? देरी के लिए किस स्तर पर जिम्मेदारी तय हुई? कार्यदायी संस्था पर लगी पेनाल्टी की वसूली कब होगी? और परियोजना को आखिर कब तक पूरा कर विभाग को हस्तांतरित किया जाएगा?
सरकारी धन से बनने वाली परियोजना में देरी का मतलब केवल अधूरी दीवारें, खाली परिसर या लंबित निर्माण नहीं होता, बल्कि इसका सीधा असर जनता के हित और सरकारी धन के उपयोग पर पड़ता है।
कथित अनियमितताओं और ‘धन के बंदरबांट’ के सवाल भी बरकरार
बुद्धा पार्क परियोजना को लेकर पहले से ही निर्माण की गुणवत्ता, खर्च और कथित अनियमितताओं के संबंध में सवाल उठते रहे हैं। अब समयसीमा के उल्लंघन, बढ़ती पेनाल्टी और वसूली न होने की स्थिति ने संदेह को और गहरा कर दिया है।
जांच के दौरान डीपीआर उपलब्ध न कराए जाने और जिम्मेदार इंजीनियरों के मौके पर मौजूद न मिलने जैसी बातों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में मांग उठ रही है कि परियोजना में अब तक हुए कार्य का तकनीकी और वित्तीय परीक्षण कराया जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि क्या मौके पर किया गया निर्माण स्वीकृत डीपीआर और निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं।
यदि सब कुछ नियमानुसार है तो पूरी जानकारी सार्वजनिक करने में देरी क्यों? और यदि कहीं कोई कमी या अनियमितता है तो जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई कब?
ठेकेदार की मनमानी या सिस्टम की मेहरबानी?
बुद्धा पार्क का मामला अब एक सीधा सवाल बनकर प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने खड़ा है
—“जुर्माना बढ़ता गया, लेकिन ठेकेदार पर कार्रवाई क्यों नहीं बढ़ी?”
करीब 25 लाख रुपये से शुरू होकर 30 लाख रुपये के पार पहुंची पेनाल्टी, अधूरा निर्माण, लंबित हैंडओवर और वसूली पर उठते सवाल यह संकेत देते हैं कि मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही की तत्काल आवश्यकता है।
जनता जानना चाहती है कि करोड़ों की परियोजना आखिर कब पूरी होगी, पार्क कब जनता को मिलेगा और ठेकेदार से देय जुर्माने की राशि कब सरकारी खाते में जमा कराई जाएगी।
बुद्धा पार्क में केवल निर्माण अधूरा है या जवाबदेही भी अधूरी छोड़ दी गई है?
अब यह सवाल सिर्फ एक पार्क का नहीं, बल्कि सरकारी धन, विभागीय जिम्मेदारी और सार्वजनिक परियोजनाओं की निगरानी की विश्वसनीयता का है।
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर मांग करता है कि संबंधित विभाग पूरे प्रकरण पर स्पष्ट स्थिति सार्वजनिक करे, परियोजना की वास्तविक प्रगति बताए, देय पेनाल्टी की अद्यतन स्थिति स्पष्ट करे तथा यदि अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन हुआ है तो नियमानुसार जिम्मेदारी और कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। क्योंकि करोड़ों के सरकारी धन की परियोजना में चुप्पी जितनी लंबी होगी, सवाल उतने ही बड़े होते जाएंगे।
