
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जिले का श्री गंगा बक्श कनोडिया इंटर कॉलेज, कप्तानगंज एक बार फिर चर्चाओं और विवादों के केंद्र में आ गया है। विद्यालय से जुड़े कुछ शिक्षकों पर पहले से लगे वित्तीय अनियमितता, सेवा नियमों के कथित उल्लंघन, चयन वेतनमान और एरियर भुगतान संबंधी आरोपों के बीच अब नया सवाल पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर उठने लगा है। शिक्षा विभाग के गलियारों में चर्चा है कि विवादित सेवा अभिलेखों के बावजूद एक शिक्षक को पदोन्नति का लाभ दिलाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं तो यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि विभागीय जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार विद्यालय से जुड़े कुछ शिक्षकों — श्याम नारायण पाण्डेय, देवेन्द्र पाण्डेय एवं विरेन्द्र पाण्डेय — के नाम पहले भी विभिन्न शिकायतों और आरोपों में सामने आते रहे हैं। आरोपों में वित्तीय अनियमितता, सेवा संबंधी तथ्यों को लेकर विवाद तथा नियमों के पालन पर सवाल शामिल बताए जाते हैं। अब इन्हीं चर्चाओं के बीच सहायक अध्यापक विरेन्द्र पाण्डेय की संभावित पदोन्नति को लेकर शिक्षा विभाग में नई बहस शुरू हो गई है।
दो वर्ष कार्य नहीं, फिर भी भुगतान? सवालों में एरियर और चयन वेतनमान
शिक्षा विभाग से जुड़े सूत्र दावा करते हैं कि संबंधित प्रकरण में कुछ शिक्षकों द्वारा बिना कार्य किए एरियर प्राप्त करने और सेवा नियमितीकरण से पहले चयन वेतनमान के लाभ लेने संबंधी आरोप लगाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन यदि ऐसा हुआ है तो यह शासनादेशों और सेवा नियमों की कसौटी पर गंभीर विषय माना जा सकता है।
विभागीय जानकारों का कहना है कि किसी कर्मचारी को सेवा नियमित होने से पूर्व चयन वेतनमान का लाभ दिया जाना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना जाता। ऐसे मामलों में सेवा अभिलेख, नियुक्ति की स्थिति, कार्य अवधि तथा वित्तीय स्वीकृतियों की गहन जांच आवश्यक होती है।
अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि पूर्व से विवादित माने जा रहे मामलों की जांच लंबित है, तो पदोन्नति जैसे संवेदनशील प्रशासनिक निर्णयों में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है? क्या पहले पुराने सवालों का जवाब नहीं मिलना चाहिए?
बर्खास्तगी के बाद भी नौकरी जारी रखने के आरोपों ने बढ़ाई संवेदनशीलता
मामले का दूसरा पहलू और भी गंभीर बताया जा रहा है। सहायक अध्यापक देवेन्द्र पाण्डेय को लेकर यह चर्चा भी विभागीय हलकों में सुनाई पड़ रही है कि बर्खास्तगी के बाद भी नौकरी जारी रखने संबंधी आरोप लगाए गए हैं। हालांकि संबंधित पक्ष का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है, लेकिन इस तरह की चर्चाओं ने पूरे प्रकरण को और संवेदनशील बना दिया है।
सूत्रों के अनुसार भ्रष्टाचार विरोधी गतिविधियों से जुड़ी एक संस्था इस मामले को कानूनी स्तर तक ले जाने की तैयारी में बताई जा रही है। यदि भविष्य में कोई न्यायिक या प्रशासनिक जांच इन आरोपों की पुष्टि करती है, तो मामला केवल विभागीय चूक नहीं बल्कि सरकारी अभिलेखों की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन सकता है।
लोकायुक्त जांच की चर्चाओं के बीच DIOS पर बढ़ा दबाव
यह पूरा विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय पहले से विभिन्न आरोपों और जांच संबंधी चर्चाओं के कारण सुर्खियों में रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार संबंधित एरियर भुगतान प्रकरण को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
ऐसे में यदि विवादों से जुड़े किसी शिक्षक को नियमों के विपरीत या बिना पर्याप्त जांच के पदोन्नति का लाभ दिए जाने की कोशिश हुई, तो इसका सीधा असर विभाग की विश्वसनीयता पर पड़ सकता है।
प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी पदोन्नति प्रक्रिया में सेवा अभिलेख, नियुक्ति की वैधता, दंड प्रविष्टि, विभागीय जांच की स्थिति और वित्तीय रिकॉर्ड की समीक्षा अत्यंत आवश्यक होती है। ऐसे में यदि इन बिंदुओं पर स्पष्टता के बिना निर्णय लिया जाता है, तो भविष्य में कानूनी विवाद खड़े होना तय माना जाता है।
क्या ‘फाइल मैनेजमेंट’ ने नियम पुस्तिका को पीछे छोड़ दिया?
शिक्षा विभाग के गलियारों में एक और चर्चा जोर पकड़ रही है। चर्चा यह है कि कुछ मामलों में वर्षों से शिकायतें, जांच और आरोप सामने आने के बावजूद न तो स्पष्ट कार्रवाई हुई, न वसूली की स्थिति स्पष्ट हुई और न ही जवाबदेही तय होती दिखाई दी।
यहीं से कटाक्ष भरा बड़ा सवाल जन्म लेता है — क्या शिक्षा विभाग में शासनादेश अब केवल फाइलों की शोभा बनकर रह गए हैं?
क्या नियमों की व्याख्या व्यक्ति देखकर बदलती है?
क्या कुछ मामलों में “फाइल मैनेजमेंट” प्रशासनिक प्रक्रिया पर भारी पड़ रहा है?
हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन विभागीय चुप्पी और लंबित सवाल संदेहों को लगातार हवा दे रहे हैं।
शासन की चुप्पी सबसे बड़ा प्रश्न
पूरा मामला अब केवल एक विद्यालय या कुछ शिक्षकों तक सीमित नहीं दिख रहा। यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।
यदि जिन शिक्षकों की सेवा, भुगतान या अभिलेखों को लेकर प्रश्न उठ रहे हों, उन्हें बिना निष्पक्ष जांच के पदोन्नति का लाभ दिया जाता है, तो इससे पूरे विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक होगा।
अब निगाहें शासन, माध्यमिक शिक्षा विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों की ओर हैं। सवाल यह है कि क्या आरोपों और चर्चाओं पर निष्पक्ष जांच होगी? क्या तथ्य सार्वजनिक किए जाएंगे? या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएगा?
फिलहाल शिक्षा विभाग की ओर से इस पूरे प्रकरण पर कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि संबंधित अधिकारी, विद्यालय प्रबंधन या नामित पक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं तो उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
— विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
