
विलेज फास्ट टाइम्स न्यूज नेटवर्क | कुशीनगर से विशेष संवाददाता
राजकोट। सरकारी धन के उपयोग को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। गुजरात के राजकोट नगर निगम (आरएमसी) से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने आम जनता से लेकर सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों तक को हैरान कर दिया है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सामने आए दस्तावेजों के अनुसार नगर निगम द्वारा चलाए गए अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान अधिकारियों, कर्मचारियों और अभियान में शामिल टीमों के चाय-नाश्ते व जलपान पर कथित तौर पर 47 लाख रुपये खर्च किए गए। यह दावा सामने आते ही सरकारी फिजूलखर्ची और वित्तीय जवाबदेही पर बहस तेज हो गई है।

देश में जहां आम नागरिक महंगाई, बेरोजगारी और मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है, वहीं सरकारी अभियान के दौरान केवल जलपान पर लाखों रुपये खर्च होने का दावा लोगों के गले नहीं उतर रहा। सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ऐसा कौन-सा चाय-नाश्ता था जिसकी कीमत लाखों रुपये तक पहुंच गई? क्या अधिकारियों के लिए पांच सितारा स्तर की व्यवस्था की गई थी या फिर सरकारी धन के उपयोग में कहीं गंभीर अनियमितता हुई है?
आरटीआई के माध्यम से सामने आए इस खर्च के ब्यौरे ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि यह खर्च वास्तविक है तो यह सरकारी संसाधनों के अत्यधिक और अनुचित उपयोग का मामला बनता है, जबकि यदि आंकड़ों में कोई त्रुटि या गड़बड़ी है तो इसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
इस खुलासे के बाद विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पूरे मामले की स्वतंत्र एवं पारदर्शी जांच की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि जनता के टैक्स से प्राप्त धन का उपयोग पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। यदि सरकारी खर्च में किसी प्रकार की अनियमितता या लापरवाही हुई है तो दोषियों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है।
वित्तीय मामलों के जानकारों का भी मानना है कि सार्वजनिक धन के प्रत्येक खर्च का स्पष्ट रिकॉर्ड और औचित्य होना चाहिए। सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल आवश्यकता है। ऐसे मामलों में समयबद्ध जांच से ही जनता का विश्वास कायम रखा जा सकता है।
विडंबना यह भी है कि कई बार नगर निगम बजट की कमी का हवाला देकर सड़क, नाली, सफाई, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास कार्यों में संसाधनों की कमी बताता है। ऐसे में यदि चाय-नाश्ते पर ही लाखों रुपये खर्च होने का दावा सामने आता है तो स्वाभाविक रूप से जनता यह जानना चाहती है कि उनके टैक्स का पैसा आखिर किस प्रकार खर्च किया जा रहा है।
फिलहाल यह मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित अधिकारी इस खर्च पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं, क्या निष्पक्ष जांच कराई जाती है और यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो क्या दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई होगी। जनता का कहना है कि सरकारी खजाना किसी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई का धन है और उसका एक-एक पैसा जवाबदेही के साथ खर्च होना चाहिए।
