
विलेज फास्ट टाइम्स | विशेष संवाददाता | कुशीनगर
सुशासन, पारदर्शिता और ई-गवर्नेंस के दावों के बीच कुशीनगर के बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी (SOC), पडरौना न्यायालय से सामने आई जांच रिपोर्ट ने न्यायिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिलाधिकारी के निर्देश पर हुए त्रिस्तरीय औचक निरीक्षण में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने ऑनलाइन व्यवस्था की विश्वसनीयता और लंबित मामलों के निस्तारण पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
जिलाधिकारी के आदेश के अनुपालन में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) वैभव मिश्रा, उपजिलाधिकारी (न्यायिक) पडरौना डॉ. संतराज तथा उपजिलाधिकारी (न्यायिक) हाटा विवेकशील यादव की संयुक्त जांच टीम ने 30 जुलाई 2026 को SOC न्यायालय का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान कंप्यूटरीकृत प्रबंधन प्रणाली में आदेश हेतु सुरक्षित 50 पत्रावलियां दर्ज थीं, लेकिन मौके पर मात्र 14 पत्रावलियां ही प्रस्तुत की जा सकीं। जब जांच का दायरा बढ़ाया गया तो पीठासीन अधिकारी के सरकारी आवास से 26 अतिरिक्त पत्रावलियां बरामद हुईं। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इनमें से 15 पत्रावलियां ऑनलाइन प्रणाली में दर्ज ही नहीं थीं।
जांच में यह भी सामने आया कि कई मामलों में महीनों पहले बहस पूरी हो चुकी थी, लेकिन आज तक आदेश पारित नहीं किए गए। इतना ही नहीं, कई आदेश निर्धारित बारकोडयुक्त फर्दकाम के बजाय साधारण कागजों पर दर्ज पाए गए, जिसे प्रक्रिया संबंधी गंभीर अनियमितता माना गया। सवाल यह उठता है कि जब सरकार न्यायालयों को डिजिटल और पारदर्शी बनाने का दावा कर रही है, तब फाइलें आखिर सरकारी आवासों तक कैसे पहुंच गईं और ऑनलाइन रिकॉर्ड से बाहर कैसे रहीं?
संयुक्त जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट टिप्पणी की है कि पत्रावलियों का समयबद्ध निस्तारण नहीं किया गया तथा उन्हें सरकारी आवास पर रखकर अनावश्यक रूप से लंबित रखा गया, जिससे अनुचित लाभ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। समिति ने विस्तृत रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौंपते हुए संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय एवं विधिक कार्रवाई की संस्तुति की है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह कार्रवाई केवल रिपोर्ट तक सीमित रहेगी, या फिर जिम्मेदारों पर ऐसी कठोर कार्रवाई होगी जो पूरे तंत्र को स्पष्ट संदेश दे कि न्यायालय फाइलें रोकने का नहीं, समय पर न्याय देने का स्थान है।
