



विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर | विशेस संवाददाता
तमकुहीराज, कुशीनगर। उत्तर प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध “जीरो टॉलरेंस” और “गांव की समस्या, गांव में समाधान” जैसे अभियानों को सुशासन की पहचान बताती है। सरकारी बैठकों में त्वरित निस्तारण के दावे किए जाते हैं, लेकिन तमकुहीराज तहसील क्षेत्र से सामने आया एक मामला इन दावों की जमीनी सच्चाई पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
बरवापट्टी थाना क्षेत्र के खानगी गांव की निवासी चांदनी देवी ने राजस्व अभिलेखों में कथित गड़बड़ी और न्याय न मिलने का आरोप लगाते हुए अपने ही दरवाजे पर आमरण अनशन शुरू कर दिया। कई दिनों तक चली इस लड़ाई में जब उनकी तबीयत लगातार बिगड़ने लगी और मामला जनचर्चा का विषय बन गया, तब प्रशासन सक्रिय हुआ। आखिरकार उपजिलाधिकारी और क्षेत्राधिकारी मौके पर पहुंचे, कार्रवाई का भरोसा दिया और इसके बाद अनशन समाप्त कराया गया।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या किसी नागरिक को अपनी बात सुनाने के लिए पहले भूखा रहना पड़ेगा, तब जाकर प्रशासन उसकी चौखट तक पहुंचेगा?
पीड़िता का आरोप है कि वह कई बार तहसील कार्यालय पहुंचीं, अधिकारियों को लिखित शिकायतें दीं और न्याय की गुहार लगाई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला। उनका कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष सुनवाई होती, तो उन्हें आमरण अनशन जैसा कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता।
अनशन के दौरान स्थानीय लोगों का भी समर्थन मिलने लगा। सामाजिक कार्यकर्ता मंटू कुशवाहा ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग की। उनका कहना है कि यदि राजस्व मामलों का समयबद्ध और पारदर्शी निस्तारण हो, तो किसी भी नागरिक को अपने अधिकारों के लिए धरना और अनशन का रास्ता नहीं अपनाना पड़े।
जैसे-जैसे चांदनी देवी की हालत बिगड़ती गई, प्रशासन पर दबाव भी बढ़ता गया। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर उनका चिकित्सकीय परीक्षण किया, जबकि बरवापट्टी थाना पुलिस भी सुरक्षा व्यवस्था में तैनात रही। बाद में उपजिलाधिकारी तमकुहीराज और क्षेत्राधिकारी जयंत कुमार ने पीड़िता से बातचीत कर निष्पक्ष कार्रवाई का भरोसा दिया, जिसके बाद उनका आमरण अनशन समाप्त हुआ।
हालांकि, अनशन खत्म होने के बाद भी असली परीक्षा अब शुरू होती है। सवाल केवल आश्वासन देने का नहीं, बल्कि उस आश्वासन को समयबद्ध कार्रवाई में बदलने का है। ग्रामीणों का कहना है कि अक्सर ऐसे मामलों में अधिकारी मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाल लेते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद फाइलें फिर कार्यालयों की अलमारियों में दब जाती हैं और शिकायतकर्ता दोबारा उसी संघर्ष के रास्ते पर लौटने को विवश हो जाता है।
यह मामला केवल खानगी गांव या चांदनी देवी तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह उस प्रशासनिक व्यवस्था का आईना भी बनता दिखाई देता है, जहां सरकारी रिपोर्टों में समस्याएं “निस्तारित” दिखा दी जाती हैं, लेकिन कई शिकायतकर्ता वास्तविक समाधान की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं। यदि गांव स्तर पर ही शिकायतों का प्रभावी समाधान हो रहा है, तो फिर लोग तहसील, जिला मुख्यालय और अंततः आमरण अनशन तक क्यों पहुंच रहे हैं?
प्रशासनिक बैठकों में प्रस्तुत उपलब्धियों और धरातल पर आम नागरिक के अनुभव के बीच दिखाई देने वाला यह अंतर चिंता का विषय बनता जा रहा है। व्यवस्था की वास्तविक सफलता केवल आंकड़ों या रिपोर्टों से नहीं, बल्कि पीड़ित व्यक्ति को समय पर मिला न्याय तय करता है।
अब पूरा मामला जिला प्रशासन की निगाह में है। लोगों की अपेक्षा है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। इससे न केवल पीड़िता को न्याय मिलेगा, बल्कि आम नागरिकों का प्रशासन पर विश्वास भी मजबूत होगा।
फिलहाल चांदनी देवी का आमरण अनशन समाप्त हो चुका है, लेकिन उनकी न्याय की लड़ाई अभी बाकी है। अब सबकी निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दिया गया आश्वासन वास्तव में न्याय का मार्ग प्रशस्त करता है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों और औपचारिक आश्वासनों के बीच सिमटकर रह जाएगा।
व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या आम नागरिक की आवाज़ तब तक अनसुनी रहेगी, जब तक वह अपनी जान जोखिम में डालकर न्याय की गुहार न लगाए?
