
लिखित आदेश के बिना आउटसोर्सिंग ऑपरेटर के हाथों सरकारी सामान की जिम्मेदारी? गोरखपुर के बाबू के कथित निर्देश का दावा, विभागीय चुप्पी पर उठे सवाल
कुशीनगर से विशेष संवाददाता | विलेज फास्ट टाइम्स
कुशीनगर। पडरौना विद्युत उपकेंद्र की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर उठे सवालों की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि अब करोड़ों रुपये की सरकारी विद्युत सामग्री से जुड़े स्टोर के संचालन और प्रभार को लेकर नया विवाद सामने आ गया है। आरोप है कि उपकेंद्र का संवेदनशील स्टोर लंबे समय से एक आउटसोर्सिंग ऑपरेटर द्वारा संचालित किया जा रहा है, जबकि उसके पास किसी सक्षम अधिकारी द्वारा जारी लिखित प्रभार आदेश मौजूद नहीं है।
मामला इसलिए भी गंभीर बताया जा रहा है क्योंकि विद्युत स्टोर में ट्रांसफार्मर, मीटर, केबल, कंडक्टर समेत लाखों-करोड़ों रुपये मूल्य की विभागीय सामग्री का रखरखाव और निर्गमन होता है। ऐसे में स्टोर की जिम्मेदारी किस अधिकारी या कर्मचारी के पास है, इसका स्पष्ट विभागीय रिकॉर्ड होना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
‘गोरखपुर के बड़े बाबू के निर्देश पर कर रहा हूं काम’
मीडिया द्वारा जब आउटसोर्सिंग ऑपरेटर अमित सिंह से स्टोर का कार्य करने के अधिकार और आदेश के संबंध में सवाल किया गया तो उन्होंने कथित तौर पर बताया कि वह गोरखपुर में तैनात बड़े बाबू वाई.के. गुप्ता के निर्देश पर स्टोर का कार्य देख रहे हैं।
लेकिन जब उनसे इस संबंध में लिखित आदेश प्रस्तुत करने को कहा गया तो कथित तौर पर कोई लिखित प्रभार आदेश उपलब्ध नहीं कराया गया।

यहीं से पूरा मामला और गंभीर हो जाता है।
यदि वास्तव में किसी सक्षम अधिकारी ने उन्हें स्टोर का दायित्व सौंपा है तो आदेश की प्रति विभागीय अभिलेखों में कहां है? और यदि कोई लिखित आदेश है ही नहीं, तो फिर वर्षों से सरकारी विद्युत सामग्री से जुड़े स्टोर का कार्य किस आधार पर कराया जा रहा है?
बड़े बाबू वाई.के. गुप्ता की भूमिका पर उठे सवाल
अमित सिंह के कथित बयान के बाद अब निगाहें गोरखपुर में तैनात बताए जा रहे बड़े बाबू वाई.के. गुप्ता की भूमिका पर टिक गई हैं।
सवाल सीधा है—क्या किसी बाबू को यह अधिकार है कि वह अपने स्तर से किसी आउटसोर्सिंग कर्मचारी को सरकारी स्टोर की जिम्मेदारी सौंप दे?
अगर हां, तो उसका लिखित आदेश, सक्षम अधिकारी की स्वीकृति और विभागीय नियम क्या कहते हैं?
और अगर ऐसा अधिकार नहीं है तो फिर कथित तौर पर उनके निर्देश का हवाला देकर आउटसोर्सिंग ऑपरेटर स्टोर का कार्य कैसे कर रहा है?
इन सवालों का जवाब अब संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को देना होगा।
सरकारी स्टोर कोई सामान्य कार्यालय नहीं
विद्युत विभाग का स्टोर महज एक कमरा या सामान रखने की जगह नहीं होता। यहां सरकारी धन से खरीदी गई विद्युत सामग्री का पूरा हिसाब-किताब जुड़ा होता है। सामग्री प्राप्त होने से लेकर उसके भंडारण, निर्गमन और स्टॉक मिलान तक प्रत्येक स्तर पर जवाबदेही निर्धारित होना आवश्यक है।
ऐसे में यदि किसी कर्मचारी को स्टोर संबंधी जिम्मेदारी दी जाती है तो उसके अधिकार, दायित्व और जवाबदेही स्पष्ट होना जरूरी है। विशेषकर आउटसोर्सिंग कर्मचारी के मामले में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसे किस कार्य के लिए अधिकृत किया गया है और क्या उसे अतिरिक्त विभागीय जिम्मेदारी दी जा सकती है।
स्टॉक रजिस्टर से खुल सकता है पूरा राज
इस मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो कई सवालों का जवाब रिकॉर्ड से मिल सकता है। मसलन—
स्टोर का प्रभार किसके नाम दर्ज है?
स्टॉक रजिस्टर किसके नियंत्रण में है?
सामग्री निर्गमन पर किसके हस्ताक्षर हैं?
किस अधिकारी ने स्टोर संचालन की अनुमति दी?
आउटसोर्सिंग कर्मचारी को कौन-कौन से कार्य सौंपे गए हैं?
और सबसे अहम—क्या उसके पास कोई लिखित प्रभार आदेश है?
यदि विभागीय अधिकारी स्टोर के प्रभार आदेश, स्टॉक रजिस्टर, सामग्री निर्गमन रजिस्टर, स्टॉक सत्यापन रिपोर्ट और संबंधित अभिलेखों की जांच कराएं तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।
विभागीय चुप्पी भी बनी बड़ा सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आउटसोर्सिंग ऑपरेटर वास्तव में लंबे समय से स्टोर का कार्य कर रहा है तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी या नहीं? यदि जानकारी थी तो अब तक लिखित आदेश और जवाबदेही सुनिश्चित क्यों नहीं की गई? और यदि जानकारी नहीं थी तो विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विलेज फास्ट टाइम्स इस मामले में किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं करता, बल्कि सामने आए आरोपों और दावों की निष्पक्ष जांच की मांग करता है। यदि आरोप निराधार हैं तो विभाग को दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई होनी चाहिए।
अब गेंद विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के पाले में है। देखना यह है कि पडरौना विद्युत उपकेंद्र के ‘स्टोर राज’ पर जांच की बिजली गिरती है या मामला विभागीय फाइलों में ही दबकर रह जाता है।
अगले अंक में खुलासा?
दस हजार रुपये वेतन पाने वाले आउटसोर्सिंग ऑपरेटर द्वारा कथित तौर पर अपने ड्राइवर को 15 हजार रुपये वेतन दिए जाने के दावे और उससे जुड़े आय-व्यय के सवालों पर अगली रिपोर्ट में दस्तावेजी पड़ताल।
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