
डीएफओ साहब! कहां गई 1.20 करोड़ पौधों की हरियाली?
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता।
कुशीनगर में हर साल पौधरोपण के नाम पर नए रिकॉर्ड बनाए जाने के दावे हो रहे हैं, लेकिन अब इन्हीं दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024, 2025 और 2026 में मिलाकर करीब 1 करोड़ 20 लाख पौधे लगाए जाने की उपलब्धि बताई जा रही है। सवाल सीधा है—अगर इतने बड़े पैमाने पर पौधे वास्तव में लगाए गए और उनकी देखभाल भी हुई, तो आज जिले की धरती पर उस हरियाली का असर साफ क्यों नहीं दिखाई देता?
अभियान आते हैं, पौधे लगाए जाते हैं, फोटो खिंचती हैं, प्रेस नोट जारी होते हैं और उपलब्धियों के आंकड़े सामने रख दिए जाते हैं। लेकिन पौधा लगाने के बाद उसकी जिंदगी का हिसाब कौन रख रहा है? कितने पौधे बचे? कितने सूख गए? कितने पौधे अब पेड़ का रूप ले चुके हैं? इन सवालों का स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब अब तक चर्चा के केंद्र में नहीं है।
करोड़ों पौधे, फिर भी हरियाली पर सवाल
यदि तीन वर्षों में 1.20 करोड़ पौधे लगाए गए हैं, तो इसका असर गांवों, ग्राम पंचायतों, सड़कों के किनारे, सरकारी जमीनों और सार्वजनिक स्थलों पर व्यापक रूप से नजर आना चाहिए। लेकिन कई इलाकों में आज भी पौधरोपण के पुराने अभियान और मौजूदा जमीनी स्थिति के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। यही अंतर अब आम लोगों के बीच सवाल पैदा कर रहा है कि पौधरोपण हुआ कितना और बचा कितना?
पौधरोपण या सिर्फ आंकड़ों का खेल?
वृक्षारोपण केवल गड्ढा खोदकर पौधा लगाने का नाम नहीं है। पौधे को जीवित रखना असली चुनौती है। नर्सरी से पौधा लाने, गड्ढा तैयार करने, मजदूरी, खाद-पानी, सुरक्षा, ट्री गार्ड और निगरानी तक सरकारी धन खर्च होता है। ऐसे में सवाल सिर्फ पौधों की संख्या का नहीं, बल्कि जनता के पैसे की उपयोगिता और परिणाम का भी है।
अगर बड़े पैमाने पर पौधे लगाए गए लेकिन संरक्षण के अभाव में वे कुछ महीनों में ही खत्म हो गए, तो जिम्मेदारी केवल मौसम या प्राकृतिक कारणों पर डालकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता। निगरानी व्यवस्था और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
डीएफओ साहब, सर्वाइवल रेट बताइए!
वन विभाग को अब सिर्फ यह बताने से आगे बढ़ना होगा कि कितने पौधे लगाए गए। जनता जानना चाहती है कि उनमें से कितने पौधे आज जीवित हैं और कितने पेड़ बन चुके हैं।
किस ब्लॉक में कितने पौधे लगाए गए? किस ग्राम पंचायत में कितने पौधे बचे? पौधों की सुरक्षा के लिए कितना बजट खर्च हुआ? कितने स्थलों का भौतिक सत्यापन कराया गया? मृत पौधों के स्थान पर दोबारा पौधे लगाए गए या नहीं? और सबसे महत्वपूर्ण—यदि पौधे बड़ी संख्या में नहीं बचे तो जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
स्वतंत्र जांच से सामने आएगा सच!
अब जरूरत केवल कागजी आंकड़ों की नहीं, बल्कि जमीन पर स्वतंत्र भौतिक सत्यापन की है। तीन वर्षों में लगाए गए 1.20 करोड़ पौधों का स्थानवार रिकॉर्ड सार्वजनिक हो, संबंधित विभागों से खर्च का विवरण मांगा जाए और चयनित स्थलों का मौके पर सत्यापन कराया जाए।
यदि पौधे वास्तव में जीवित हैं तो उनकी तस्वीर, स्थान और संख्या सार्वजनिक करने में विभाग को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। और यदि दावों के अनुरूप पौधे धरातल पर नहीं मिलते, तो फिर जिम्मेदारी और जवाबदेही तय होना भी जरूरी है।
सवालों के घेरे में पूरा अभियान
जनता का सवाल है—तीन वर्षों में कुल कितना सरकारी धन खर्च हुआ? प्रति पौधा कितना खर्च आया? 1.20 करोड़ में से कितने पौधे जीवित हैं? कितने पेड़ बन चुके हैं? संरक्षण पर कितना खर्च हुआ? भौतिक सत्यापन कितनी जगह हुआ? और पौधे न बचने पर कार्रवाई किसके खिलाफ हुई?
पौधा लगाना उपलब्धि हो सकता है, लेकिन उसे पेड़ बनाना ही असली सफलता है। इसलिए अब सवाल आंकड़ों से आगे निकल चुका है। डीएफओ साहब! यदि 1.20 करोड़ पौधे धरती पर मौजूद हैं, तो उनकी हरियाली जनता को दिखाईए—और यदि नहीं हैं, तो बताइए कि सरकारी रिकॉर्ड के करोड़ों पौधे आखिर गए कहां
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