
एसडीएम के निरीक्षण पर नोटिस, अध्यक्ष पति की सक्रियता पर उठे सवाल; ईओ के “सांसद प्रतिनिधि” वाले जवाब ने बढ़ाई उलझन
कुशीनगर, 30 अगस्त। विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता।
कुशीनगर नगर पालिका परिषद में इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा अधिकार, कुर्सी और प्रशासनिक भूमिका की चर्चा तेज है। एक तरफ निर्वाचित अध्यक्ष किरन जायसवाल ने एसडीएम के निरीक्षण को लेकर सवाल उठाते हुए नोटिस जारी किया, वहीं दूसरी तरफ अध्यक्ष के पति राकेश जायसवाल की नगर पालिका के कामकाज में कथित सक्रिय भूमिका अब सवालों के घेरे में आ गई है।
मामला केवल अध्यक्ष कक्ष में एक अतिरिक्त कुर्सी का नहीं, बल्कि उस कुर्सी से जुड़े अधिकार और प्रभाव का है। सवाल उठ रहे हैं कि राकेश जायसवाल आखिर किस आधिकारिक हैसियत से अध्यक्ष कक्ष में अध्यक्ष की कुर्सी के ठीक बगल बैठते हैं और नगर पालिका के अधिकारियों व कर्मचारियों के बीच सक्रिय दिखाई देते हैं?

बताया जाता है कि पालिका के कामकाज से जुड़े मामलों में उनकी मौजूदगी चर्चा का विषय रही है। अधिकारियों के साथ सक्रियता से लेकर नगर में चल रहे निर्माण कार्यों के मौके पर निरीक्षण तक उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि नगर पालिका में अधिकार की सीमा आखिर कहां तक है और गैर-निर्वाचित व्यक्ति की प्रशासनिक भूमिका किस आधार पर तय होती है?
ईओ बोलीं—“सांसद प्रतिनिधि हैं”, लेकिन किस सांसद के?
मीडिया ने जब अधिशासी अधिकारी अंकिता शुक्ला से सवाल किया कि राकेश जायसवाल किस नियम, अधिनियम अथवा शासनादेश के तहत अध्यक्ष कक्ष में बैठते हैं और नगर पालिका के कामकाज में सक्रिय दिखाई देते हैं, तो जवाब मिला—“आपको जानकारी नहीं है, वह सांसद प्रतिनिधि हैं।”

लेकिन इसी जवाब ने एक नई बहस छेड़ दी।
मीडिया के अगले सवाल—“किस सांसद के प्रतिनिधि हैं?”—का स्पष्ट जवाब सामने नहीं आ सका। अब सवाल यह है कि यदि राकेश जायसवाल वास्तव में किसी सांसद के अधिकृत प्रतिनिधि हैं तो संबंधित सांसद का नाम, नियुक्ति अथवा प्राधिकरण पत्र, नियुक्ति की तिथि और उनकी जिम्मेदारियों का स्पष्ट विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
पद है तो आदेश कहां है? आदेश है तो रिकॉर्ड कहां है? और रिकॉर्ड है तो जनता से छिपा क्यों है?
अध्यक्ष प्रतिनिधि या सांसद प्रतिनिधि—असली पहचान कौन सी?
राकेश जायसवाल की भूमिका को लेकर पहले भी अलग-अलग चर्चाएं सामने आती रही हैं। कहीं उन्हें अध्यक्ष प्रतिनिधि बताया जाता है, जबकि अब ईओ उन्हें सांसद प्रतिनिधि बता रही हैं। यदि वह अध्यक्ष के प्रतिनिधि हैं तो इसके लिए कानूनी अथवा प्रशासनिक आधार क्या है? यदि सांसद प्रतिनिधि हैं तो किस सांसद के?

और यदि दोनों भूमिकाएं हैं, तो दोनों के लिखित आदेश कहां हैं?
एक व्यक्ति, दो पहचान और अधिकारों का स्पष्ट दस्तावेज—यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बनता जा रहा है।
शिलापट्ट पर नाम, कक्ष में कुर्सी—महज संयोग या कोई व्यवस्था?
विवाद इसलिए भी गहराता है क्योंकि नगर पालिका के कुछ विकास कार्यों के शिलापट्टों पर अध्यक्ष का नाम “किरन जायसवाल” होने के बावजूद “किरन राकेश जायसवाल” लिखे जाने को लेकर पहले सवाल उठ चुके हैं। उस समय इसे “प्रचलन” बताया गया था।
अब अध्यक्ष कक्ष में राकेश जायसवाल की कथित सक्रिय मौजूदगी और उन्हें सांसद प्रतिनिधि बताए जाने के बाद सवाल फिर खड़ा हो गया है—क्या यह केवल प्रचलन है या किसी आधिकारिक व्यवस्था का हिस्सा?
यदि व्यवस्था है तो नियम क्या है?
यदि नियम है तो शासनादेश कहां है?
और यदि लिखित आदेश है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
निर्माण कार्यों के निरीक्षण में भूमिका क्या?
राकेश जायसवाल की भूमिका को लेकर सवाल सिर्फ चर्चाओं तक सीमित नहीं हैं। सोशल मीडिया पर मौजूद तस्वीरों में उनके नगर में चल रहे निर्माण कार्यों के दौरान ईओ के साथ मौके पर दिखाई देने की बात सामने आई है।

अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि वह नगर पालिका के अधिकारी, कर्मचारी अथवा निर्वाचित सदस्य नहीं हैं तो सरकारी निर्माण कार्यों के निरीक्षण में उनकी भूमिका क्या है?
क्या वह किसी अधिकृत निरीक्षण टीम का हिस्सा हैं?
क्या उनके निरीक्षण का कोई कार्यालयी आदेश है?
क्या उनके सुझाव अथवा निर्देश सरकारी अभिलेखों में दर्ज हैं?
और यदि नहीं, तो फिर सरकारी निर्माण कार्यों के बीच उनकी सक्रिय मौजूदगी किस आधिकारिक हैसियत से है?
एसडीएम के अधिकार पर सवाल, तो ‘पालिका के भीतर’ की भूमिका पर जवाब क्यों नहीं?
इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि एसडीएम के निरीक्षण और अधिकार क्षेत्र को लेकर नगर पालिका की ओर से सवाल उठाए गए, नोटिस जारी हुआ और मामला जिलाधिकारी स्तर तक पहुंचा। दूसरी ओर अध्यक्ष पति की कथित प्रशासनिक सक्रियता पर अब तक स्पष्ट दस्तावेजी जवाब सामने नहीं आया है।

कानून और नियमों की कसौटी यदि प्रशासनिक अधिकारियों पर लागू होती है, तो सार्वजनिक निकाय के भीतर सक्रिय हर व्यक्ति की भूमिका भी उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए।
फिलहाल कुशीनगर नगर पालिका में बहस सिर्फ एक कुर्सी की नहीं है। बहस इस बात की है कि कुर्सी निर्वाचित प्रतिनिधि की हो सकती है, लेकिन उसके आसपास तय होने वाले फैसलों और प्रभाव की वास्तविक रेखा आखिर कहां तक जाती है?
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर का सीधा सवाल है—नगर पालिका में अधिकार किसका, जिम्मेदारी किसकी और जवाबदेही आखिर किसकी?
सवालों का जवाब संबंधित प्रशासन और नगर पालिका को दस्तावेजों के साथ देना होगा, क्योंकि सरकारी कार्यालयों में केवल कुर्सियां ही नहीं, बल्कि उन कुर्सियों से जुड़े अधिकार भी कानून और नियमों से तय होते हैं।


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