
विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। कप्तानगंज स्थित कनोडिया इंटरमीडिएट कॉलेज से जुड़ा विवाद अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। विद्यालय में शिक्षकों के वेतन, एरियर, विनियमितीकरण और चयन वेतनमान से जुड़े पुराने आरोपों के बीच अब एक पत्रकार के नाम से जिलाधिकारी को कथित रूप से फर्जी शिकायत दिए जाने का मामला सामने आया है। पत्रकार संजय चाणक्य का स्पष्ट दावा है कि उन्होंने जिलाधिकारी को ऐसी कोई शिकायत नहीं दी और शिकायत पत्र पर दर्ज हस्ताक्षर उनके नहीं हैं। यदि जांच में यह दावा सही पाया जाता है तो मामला महज विद्यालयी विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसी व्यक्ति की पहचान और हस्ताक्षर के कथित दुरुपयोग का गंभीर प्रश्न खड़ा करेगा।
बताया जा रहा है कि जिलाधिकारी को दिए गए कथित शिकायती पत्र में कनोडिया इंटरमीडिएट कॉलेज के प्रधानाचार्य जितेन्द्र तिवारी तथा सहायक अध्यापक अरुण कुमार मिश्रा के विरुद्ध वित्तीय वर्ष 2025-26 का आयकर जमा न करने और राजस्व को कथित नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए हैं। शिकायत के अंत में पत्रकार संजय चाणक्य का नाम, पद और कथित हस्ताक्षर दर्ज होने की बात सामने आई है।
संजय चाणक्य के अनुसार, उन्हें जब इस शिकायत की जानकारी मिली तो उन्होंने तत्काल मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। उनका कहना है कि यदि उनके नाम और हस्ताक्षर का किसी ने उनकी अनुमति अथवा जानकारी के बिना इस्तेमाल किया है तो इसकी सच्चाई सामने आनी चाहिए और दोषी व्यक्ति के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
जिस मामले को उठाया, उसी में शिकायतकर्ता बनने का ‘खेल’ क्यों?
कनोडिया इंटरमीडिएट कॉलेज का विवाद कोई नया मामला नहीं है। विद्यालय के कुछ शिक्षकों की सेवा संबंधी स्थिति, कथित शैक्षिक अभिलेख, एरियर भुगतान, विनियमितीकरण और चयन वेतनमान से संबंधित सवालों को लेकर पूर्व में भी विभिन्न समाचार माध्यमों में खबरें प्रकाशित होती रही हैं।
आरोपों के अनुसार, सहायक अध्यापक श्याम नारायण पाण्डेय और वीरेंद्र पाण्डेय से जुड़े मामलों में जुलाई 2012 से जून 2014 के बीच लगभग दो वर्षों तक कार्य किए बिना वेतन अथवा एरियर भुगतान प्राप्त करने के सवाल उठाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि सक्षम विभागीय अथवा न्यायिक जांच के बाद ही मानी जा सकती है।
इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज विद्यालय की मूल उपस्थिति पंजिका बताई जा रही है। आरोप है कि संबंधित अवधि की मूल उपस्थिति पंजिका में संबंधित शिक्षकों के हस्ताक्षर उपलब्ध नहीं हैं। यदि ऐसा है तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि बिना उपस्थिति और कार्य के भुगतान किस आधार पर किया गया और भुगतान को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी किन अधिकारियों अथवा कर्मचारियों की थी?

2018 में विनियमितीकरण, फिर 2008 से चयन वेतनमान का दावा!
विवाद का दूसरा अहम बिंदु चयन वेतनमान से जुड़ा बताया जा रहा है। उपलब्ध आरोपों के अनुसार, जिन शिक्षकों का विनियमितीकरण वर्ष 2018 में हुआ, उन्हें चयन वेतनमान का लाभ इससे पूर्व की अवधि से दिए जाने पर सवाल उठे हैं।
यहां जांच का मूल प्रश्न यही है कि यदि किसी कर्मचारी का विनियमितीकरण बाद की तारीख में हुआ तो उससे पहले की अवधि के वित्तीय लाभ की पात्रता किस नियम अथवा आदेश के आधार पर निर्धारित की गई? क्या इसके लिए सक्षम अधिकारी की स्वीकृति थी? संबंधित सेवा पुस्तिका, वेतन निर्धारण पत्र, विनियमितीकरण आदेश और चयन वेतनमान की स्वीकृति में क्या दर्ज है?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है। इसलिए पूरे प्रकरण में आरोप-प्रत्यारोप के बजाय मूल अभिलेखों की जांच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन गई है।
शिक्षा विभाग की जांच और ‘नो वर्क, नो पे’ का सवाल
प्रकरण में शिक्षा निदेशालय स्तर से भी जांच और पत्राचार होने का दावा किया जा रहा है। आरोप है कि जांच के दौरान मूल उपस्थिति पंजिका में संबंधित शिक्षकों की उपस्थिति को लेकर सवाल सामने आए तथा कार्य प्रमाणित किए जाने पर आपत्ति दर्ज की गई।
यदि विभागीय अभिलेख वास्तव में इस तरह की स्थिति दर्शाते हैं तो ‘नो वर्क, नो पे’ के सिद्धांत के तहत भुगतान की वैधता की जांच जरूरी हो जाती है। साथ ही यह भी देखना होगा कि भुगतान किस अधिकारी की संस्तुति पर हुआ, किस स्तर से स्वीकृत हुआ और यदि भुगतान अनियमित पाया जाता है तो उसकी वसूली तथा जिम्मेदारी तय करने के लिए क्या कार्रवाई की गई।
यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला सिर्फ शिक्षकों के विवाद से निकलकर सरकारी धन और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन जाता है।
आईजीआरएस रिपोर्ट पर भी उठे सवाल
मामले को लेकर मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल आईजीआरएस पर शिकायत किए जाने की बात भी सामने आई है। बताया गया है कि शिकायत की जांच के दौरान विद्यालय के प्रधानाचार्य से संबंधित अभिलेखों के आधार पर आख्या मांगी गई थी।
सूत्रों के अनुसार, प्रधानाचार्य ने मूल उपस्थिति पंजिका, विभागीय पत्राचार और अन्य दस्तावेजों के आधार पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर विभाग को उपलब्ध कराई। आरोप यह भी है कि रिपोर्ट में बड़ी संख्या में दस्तावेज संलग्न किए गए थे, जबकि आईजीआरएस पर अपलोड की गई रिपोर्ट अपेक्षाकृत संक्षिप्त रही।
हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यही वजह है कि आईजीआरएस प्रकरण में मूल शिकायत, जांच अधिकारी की रिपोर्ट, संलग्न दस्तावेज और पोर्टल पर अपलोड की गई अंतिम आख्या को सार्वजनिक जांच के दायरे में लाना जरूरी हो जाता है।
अब असली सवाल—पत्र किसने दिया?
पूरे मामले में सबसे बड़ा और सीधा सवाल विद्यालय के आरोपों से भी आगे निकल चुका है—जिलाधिकारी कार्यालय में कथित शिकायत आखिर किसने जमा की?
यदि शिकायतकर्ता संजय चाणक्य नहीं हैं, तो शिकायत पत्र कार्यालय तक कैसे पहुंचा? उसे किस व्यक्ति ने प्रस्तुत किया? क्या कार्यालय में शिकायत जमा करने वाले व्यक्ति का कोई विवरण दर्ज है? क्या प्राप्ति रजिस्टर, डायरी नंबर, प्रस्तुतकर्ता की जानकारी या अन्य कार्यालयी रिकॉर्ड उपलब्ध है? शिकायत पत्र की मूल प्रति सुरक्षित है या नहीं?
और सबसे अहम—हस्ताक्षर वास्तव में किसके हैं?
यदि संजय चाणक्य अपने हस्ताक्षर से साफ इनकार कर रहे हैं तो हस्ताक्षर का विशेषज्ञ परीक्षण कराया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर उपलब्ध प्रमाणित नमूनों से तुलना कराई जा सकती है। इससे काफी हद तक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
कलेक्ट्रेट के सीसीटीवी कैमरे भी बन सकते हैं अहम सबूत
पत्रकार संजय चाणक्य ने कलेक्ट्रेट परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच कराने की मांग की है। यदि शिकायत हाल की है और सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध है तो संबंधित दिन और समय की रिकॉर्डिंग की जांच महत्वपूर्ण सुराग दे सकती है।
किसने कार्यालय में प्रवेश किया, शिकायत किसने जमा की और किस प्रक्रिया के तहत पत्र स्वीकार किया गया—इन सवालों का जवाब कार्यालयी रिकॉर्ड और उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों से निकाला जा सकता है।
आरोपों की जांच हो, लेकिन ‘फर्जी शिकायत’ का सच भी सामने आए
इस पूरे प्रकरण में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि समाचार में लगाए गए आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। श्याम नारायण पाण्डेय, वीरेंद्र पाण्डेय, प्रधानाचार्य जितेन्द्र तिवारी तथा अन्य संबंधित पक्षों का पक्ष और सक्षम विभाग की अंतिम जांच इस मामले में महत्वपूर्ण होगी।
लेकिन यदि किसी व्यक्ति के नाम और कथित हस्ताक्षर का उसकी जानकारी के बिना इस्तेमाल किया गया है, तो यह बेहद गंभीर विषय है। शिकायत के माध्यम से किसी व्यक्ति की पहचान का कथित दुरुपयोग कर प्रशासनिक जांच को किसी अन्य दिशा में मोड़ने की कोशिश हुई या नहीं—यह जांच का विषय है।
अब जरूरत आरोपों की राजनीति की नहीं, दस्तावेजों की फोरेंसिक पड़ताल की है।
मूल शिकायत पत्र सामने आए। शिकायत जमा करने वाले की पहचान हो। कलेक्ट्रेट के रिकॉर्ड और सीसीटीवी की जांच हो। हस्ताक्षर का विशेषज्ञ परीक्षण कराया जाए। विद्यालय की मूल उपस्थिति पंजिका, सेवा पुस्तिका, विनियमितीकरण आदेश, चयन वेतनमान की स्वीकृति, वेतन भुगतान और एरियर से जुड़े अभिलेखों की स्वतंत्र जांच हो।
तभी यह साफ हो सकेगा कि कनोडिया इंटरमीडिएट कॉलेज में वर्षों से चले आ रहे आरोपों के पीछे वास्तविकता क्या है और पत्रकार के नाम से कथित शिकायत आखिर किसने और किस उद्देश्य से तैयार की।
फिलहाल गेंद प्रशासन के पाले में है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि शिकायत सही थी या गलत—सवाल यह भी है कि यदि शिकायतकर्ता ने शिकायत की ही नहीं, तो उसके नाम और कथित हस्ताक्षर का इस्तेमाल किसने किया? इस सवाल का जवाब ही पूरे ‘फर्जी शिकायत’ प्रकरण की सबसे बड़ी कड़ी साबित हो सकता है।
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