
स्थानीय जांच पर उठे सवाल, अब बाहरी जिले के अफसर करेंगे पड़ताल; 3 जून की रिपोर्ट पर टिकी विभाग की सांसें
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। शिक्षा विभाग में सब कुछ “ठीक-ठाक” होने का दावा करने वाले तंत्र के भीतर अब सवालों का तूफान उठ खड़ा हुआ है। जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त के खिलाफ चल रही लोकायुक्त जांच ने ऐसा मोड़ ले लिया है, जिसने पूरे शिक्षा महकमे की कार्यप्रणाली को कठघरे में ला खड़ा किया है। जिन आरोपों को लेकर अब तक फाइलों, दफ्तरों और “मैनेजमेंट” की फुसफुसाहटें सुनाई पड़ रही थीं, वही मामला अब मण्डलस्तरीय जांच की दहलीज तक पहुंच चुका है।
सूत्रों की मानें तो शिकायतकर्ता की समय रहते दर्ज कराई गई आपत्ति ने उस जांच व्यवस्था की दिशा ही बदल दी, जिस पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे थे। अब लोकायुक्त ने साफ संकेत दे दिया है कि मामला सामान्य औपचारिक जांच का नहीं, बल्कि तथ्यों, अभिलेखों और जवाबदेही का है।
बताया जाता है कि लोकायुक्त कार्यालय द्वारा पूर्व में जारी निर्देशों के तहत जिलाधिकारी की अध्यक्षता में त्रिसदस्यीय जांच समिति गठित करने की बात कही गई थी। इसके अनुपालन में स्थानीय स्तर पर जांच टीम बना भी दी गई, लेकिन शिकायतकर्ता विरेन्द्र सिंह ने उसी पर गंभीर सवाल दाग दिए। आरोप था कि स्थानीय जांच से निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है और पूरा प्रकरण “लीपापोती” की भेंट चढ़ सकता है।

यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया। शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों, अभिलेखों और डिजिटल साक्ष्यों को संज्ञान में लेते हुए लोकायुक्त सचिवालय ने अब मण्डलायुक्त स्तर पर हस्तक्षेप का रास्ता चुना है। नए निर्देशों के अनुसार, कुशीनगर से बाहर के वरिष्ठ अधिकारियों की तीन सदस्यीय समिति पूरे मामले की जांच करेगी और शिकायतकर्ता को भी अपना पक्ष रखने तथा साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाएगा। प्रशासनिक गलियारों में इसे लोकायुक्त का “सख्त संकेत” माना जा रहा है कि इस बार जांच सिर्फ कागजी औपचारिकता नहीं होगी।
आरोपों की फेहरिस्त लंबी, सवालों के घेरे में पूरा तंत्र
डीआईओएस पर लगे आरोप केवल एक-दो बिंदुओं तक सीमित नहीं हैं। शिकायत में फर्जी नियुक्तियों को संरक्षण देने, बिना कार्य किए लाखों रुपये एरियर भुगतान कराने, नियमों के विपरीत लाभ दिलाने, शिकायतों को पोर्टल पर निस्तारित दिखाकर दबाने और पद के प्रभाव से कथित अकूत संपत्ति अर्जित करने जैसे गंभीर आरोप शामिल बताए जा रहे हैं।
कप्तानगंज स्थित कनोडिया इंटरमीडिएट कॉलेज का मामला इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। आरोप है कि कुछ शिक्षकों को बिना वास्तविक कार्य किए भारी भरकम एरियर भुगतान कराया गया। इतना ही नहीं, एक शिक्षक पर तथ्य छिपाकर नियुक्ति लेने तक का आरोप लगाया गया है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि आरोपों में दम नहीं था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई, और यदि दम था तो जवाबदेही किसकी तय होगी?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि कार्रवाई के बजाय मामलों को तकनीकी आधारों और अधूरे आदेशों का हवाला देकर “निस्तारित” दिखाने की कोशिश की गई। यही कारण है कि अब सवाल सिर्फ एक अधिकारी पर नहीं, बल्कि उस पूरी प्रशासनिक शैली पर उठ रहे हैं जिसमें शिकायतों का समाधान कम और निस्तारण ज्यादा दिखाई देता है।
परीक्षा केंद्र या कमाई केंद्र? आरोपों ने बढ़ाई बेचैनी
मामले का सबसे विस्फोटक हिस्सा बोर्ड परीक्षा केंद्र निर्धारण प्रक्रिया को लेकर सामने आया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि परीक्षा केंद्र आवंटन को कथित तौर पर “कमाई के जरिये” में बदल दिया गया।
दावा किया गया है कि बोर्ड द्वारा केंद्रों की संख्या घटाए जाने के बावजूद जिले में पुनः केंद्र आवंटन की प्रक्रिया अपनाई गई और ऐसे विद्यालयों को भी केंद्र बना दिया गया, जिनकी व्यवस्थाएं निर्धारित मानकों पर खरी नहीं उतरती थीं। आरोपों के मुताबिक कई विद्यालयों में पर्याप्त कक्ष, सीसीटीवी निगरानी, सुरक्षा व्यवस्था और आवश्यक संसाधनों तक का अभाव था, फिर भी उन्हें केंद्र का दर्जा मिल गया।
यदि यह आरोप जांच में प्रमाणित होते हैं तो सवाल सिर्फ परीक्षा व्यवस्था पर नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी खड़े होंगे।
3 जून पर निगाहें, विभाग में बढ़ी बेचैनी
लोकायुक्त के निर्देश के बाद शिक्षा विभाग में खामोशी जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन अंदरखाने में बेचैनी साफ महसूस की जा रही है। वजह भी साफ है—यदि जांच टीम ने सेवा पुस्तिकाओं, नियुक्तियों, एरियर भुगतान, वित्तीय अनुमोदनों और परीक्षा केंद्र निर्धारण की फाइलों को गंभीरता से खंगाला, तो दायरा बढ़ सकता है और नए नाम भी सामने आ सकते हैं।
अब सबकी निगाह 3 जून पर टिकी है, जब जांच रिपोर्ट लोकायुक्त के समक्ष प्रस्तुत होनी है। क्योंकि इस बार सवाल केवल एक डीआईओएस का नहीं, बल्कि उस शिक्षा व्यवस्था का है, जो बच्चों के भविष्य की संरक्षक मानी जाती है। और यदि आरोपों की परतें सच साबित हुईं, तो यह महज भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा तंत्र की आत्मा पर लगा गंभीर प्रश्नचिह्न माना जाएगा।
