
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
हादसा या लापरवाही का साम्राज्य? ईंट भट्ठों की सुरक्षा व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
कुशीनगर। कसया थाना क्षेत्र के ग्राम सभा मैनपुर के टोला दीनापट्टी स्थित पंकज ईंट उद्योग (आरएम मार्का ईंट) पर शनिवार को हुए दर्दनाक हादसे ने पूरे जनपद को झकझोर कर रख दिया है। मिट्टी और धुएं के बीच मजदूरी कर परिवार पालने आए श्रमिकों के तीन मासूम बच्चे पानी से भरे गहरे गड्ढे में समा गए और देखते ही देखते खुशियां मातम में बदल गईं। लेकिन यह मामला अब केवल डूबकर मौत का नहीं रह गया है, बल्कि इस घटना ने जिले में संचालित ईंट भट्ठों की पूरी व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और सुरक्षा मानकों की पोल खोलकर रख दी है।

ग्रामीणों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि ईंट भट्ठे पर सुरक्षा के जरूरी इंतजाम किए गए होते, पानी भरे खतरनाक गड्ढों के चारों तरफ बैरिकेडिंग होती, चेतावनी बोर्ड लगाए गए होते और बच्चों की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारी निभाई गई होती, तो शायद आज तीन मासूम जिंदगियां बच सकती थीं। हादसे के बाद मौके पर पहुंचे लोगों की आंखें उस समय नम हो गईं जब चीखते-बिलखते परिजन अपने बच्चों के शवों से लिपटकर इंसाफ की गुहार लगाते दिखे।
जानकारों की मानें तो किसी भी ईंट भट्ठे के संचालन के लिए कई विभागों से अनुमति लेना अनिवार्य होता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी, खनन विभाग की अनुमति, राजस्व विभाग की स्वीकृति, श्रम विभाग में मजदूरों का पंजीकरण, अग्निशमन विभाग की अनापत्ति, पर्यावरणीय मानकों का पालन और श्रमिक सुरक्षा व्यवस्था जैसे नियम केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि आखिर पंकज ईंट उद्योग में इन मानकों का पालन किस स्तर तक किया गया था?

हादसे के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि क्या जिले में संचालित तमाम ईंट भट्ठे नियमों के अनुसार चल रहे हैं या फिर विभागीय मिलीभगत और कागजी खानापूर्ति के सहारे धड़ल्ले से संचालन जारी है? ग्रामीणों का आरोप है कि जिले में कई ईंट भट्ठों पर सुरक्षा व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। मजदूरों के बच्चों के लिए न कोई सुरक्षित क्षेत्र बनाया गया है और न ही खतरनाक स्थानों को चिन्हित किया गया है। आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि कई भट्ठों पर नियमों को ताक पर रखकर मनमाने तरीके से खनन और संचालन किया जा रहा है।
जिलाधिकारी द्वारा पांच सदस्यीय जांच समिति गठित कर मृतकों के परिजनों को सहायता राशि देने की घोषणा जरूर की गई है, लेकिन अब जनता की निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिक गई हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या जांच सिर्फ हादसे तक सीमित रहेगी या फिर भट्ठे के लाइसेंस, खनन अनुमति, श्रम कानूनों, सुरक्षा मानकों और विभागीय जिम्मेदारियों की भी परतें खुलेंगी?
सूत्रों का दावा है कि यदि निष्पक्ष और गहन जांच हुई तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर तीन मासूमों की मौत का जिम्मेदार सिर्फ पानी से भरा गड्ढा है या फिर नियमों को कुचलकर चल रही पूरी व्यवस्था? कुशीनगर में उठ रही यह आवाज अब केवल इंसाफ की मांग नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है।
