
राकेश जायसवाल की कथित सक्रियता को लेकर वैधानिक अधिकार स्पष्ट करने की मांग, शासनादेश के अनुपालन पर प्रशासन से जवाब की अपेक्षा
विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर में विकास कार्यों के साथ अब प्रशासनिक अधिकारों और जिम्मेदारियों की सीमाओं को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। निर्वाचित अध्यक्ष किरन जायसवाल के पति राकेश जायसवाल की पालिका के कुछ कार्यों और निर्माण स्थलों पर कथित मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि इन सवालों के संबंध में संबंधित पक्ष का आधिकारिक पक्ष और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर स्थिति स्पष्ट होना अभी महत्वपूर्ण है।
मामले का मुख्य प्रश्न यह है कि यदि कोई गैर-निर्वाचित व्यक्ति नगर पालिका के सरकारी निर्माण कार्यों के निरीक्षण के दौरान अधिकारियों के साथ मौजूद रहता है अथवा किसी प्रशासनिक गतिविधि में भाग लेता है, तो उसकी भूमिका किस वैधानिक या प्रशासनिक प्राधिकार के तहत निर्धारित है?
यदि ऐसी कोई लिखित अनुमति या अधिकृत आदेश है, तो उसे सामने रखकर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। यदि कोई औपचारिक प्राधिकार नहीं है, तो प्रशासनिक स्तर पर यह भी स्पष्ट किया जाना अपेक्षित है कि संबंधित व्यक्ति की मौजूदगी को किस रूप में देखा गया।
2012 के शासनादेश से जुड़ा सवाल
उत्तर प्रदेश शासन के नगर विकास विभाग ने 10 अक्टूबर 2012 को शासनादेश संख्या 3905/नौ-1-2012-8ई/1995 जारी किया था। इसमें स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिला पदाधिकारियों के पति अथवा संबंधियों द्वारा प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप को लेकर दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया गया है।
शासनादेश की भावना यह है कि निर्वाचित महिला पदाधिकारी अपने अधिकारों और दायित्वों का स्वतंत्र रूप से निर्वहन करें तथा उनके स्थान पर अथवा उनके साथ उनके संबंधियों या अन्य व्यक्तियों को निकाय के प्रशासनिक कार्यों में शामिल न किया जाए।
इसी कारण कुशीनगर पालिका को लेकर उठ रहे सवालों में इस शासनादेश का संदर्भ महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि किसी व्यक्ति की मौजूदगी मात्र को शासनादेश का उल्लंघन मान लेना उचित नहीं होगा। इसके लिए उसकी वास्तविक भूमिका, किसी निर्देश या हस्तक्षेप की स्थिति तथा संबंधित अभिलेखों की जांच आवश्यक होगी।
निरीक्षण की भूमिका का आधार क्या?
निर्माण कार्यों के निरीक्षण में आमतौर पर संबंधित अधिकारी और तकनीकी कर्मचारी अपनी निर्धारित जिम्मेदारियों के अनुसार कार्य करते हैं। ऐसे में यदि राकेश जायसवाल किसी निर्माण स्थल पर अधिकारियों के साथ मौजूद रहे हैं, तो यह स्पष्ट किया जाना उपयोगी होगा कि उनकी भूमिका क्या थी।
क्या वह केवल अध्यक्ष के पति के रूप में मौके पर मौजूद थे?
क्या उन्होंने किसी कार्य का निरीक्षण किया?
क्या उन्होंने अधिकारियों या कर्मचारियों को कोई निर्देश दिया?
क्या उनके निरीक्षण का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार हुआ?
या उनकी मौजूदगी केवल अनौपचारिक थी?
इन सवालों के जवाब से ही यह निर्धारित हो सकेगा कि मामला वास्तव में प्रशासनिक हस्तक्षेप का है या केवल किसी जनप्रतिनिधि के साथ एक व्यक्ति की सामान्य मौजूदगी का।
बैठकों और अभिलेखों को लेकर भी स्पष्टता जरूरी
उल्लेखित शासनादेश में नगर निकायों की बैठकों में निर्वाचित अथवा पदेन पदाधिकारी से अलग व्यक्तियों की भागीदारी तथा मत अभिव्यक्ति को लेकर दिशा-निर्देश दिए गए हैं। महिला पदाधिकारी के संबंधियों द्वारा निकाय के अभिलेखों के अवलोकन के संबंध में भी प्रतिबंधात्मक निर्देशों का उल्लेख है।
ऐसे में यदि किसी गैर-निर्वाचित व्यक्ति की ओर से बैठक में भाग लेने, अभिलेख देखने अथवा प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित करने जैसी कोई शिकायत सामने आती है, तो उसकी तथ्यात्मक जांच किया जाना स्वाभाविक है।
लेकिन जब तक संबंधित रिकॉर्ड, आदेश या प्रत्यक्ष प्रमाण सामने न हों, किसी व्यक्ति को शासनादेश का उल्लंघनकर्ता घोषित करना उचित नहीं होगा।
अध्यक्ष और ईओ से भी अपेक्षित है स्थिति स्पष्ट करना
इस मामले में अध्यक्ष किरन जायसवाल और नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी का पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
यदि राकेश जायसवाल की पालिका परिसर अथवा निर्माण स्थलों पर मौजूदगी हुई है, तो प्रशासन यह स्पष्ट कर सकता है कि उन्हें वहां किस भूमिका में देखा गया। यदि किसी कार्य के निरीक्षण के दौरान वह मौजूद रहे हैं तो संबंधित निरीक्षण का आधिकारिक रिकॉर्ड भी स्थिति स्पष्ट करने में सहायक हो सकता है।
इसी तरह यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि क्या इस संबंध में कभी कोई लिखित आपत्ति, शिकायत, रिपोर्ट या कार्यालयी पत्राचार हुआ है।
यदि कोई शिकायत नहीं हुई है तो केवल चर्चाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। और यदि लिखित शिकायत हुई है तो उसकी जांच की स्थिति सामने आनी चाहिए।
एसडीएम निरीक्षण और 11 बिंदुओं की जांच से बढ़ी उम्मीद
नगर पालिका के कामकाज को लेकर एसडीएम स्तर पर निरीक्षण की कार्रवाई और अध्यक्ष की ओर से एसडीएम को नोटिस दिए जाने का मामला सामने आने के बाद प्रकरण पहले से चर्चा में है। इसके बाद जिलाधिकारी के निर्देश पर नगर पालिका से जुड़े 11 बिंदुओं पर जांच शुरू होने की जानकारी है।
अब महत्वपूर्ण यह होगा कि जांच केवल वित्तीय अथवा निर्माण संबंधी बिंदुओं तक सीमित रहती है या प्रशासनिक भूमिका से जुड़े सवालों को भी आवश्यकतानुसार देखा जाता है।
यदि जांच के दौरान यह सामने आता है कि किसी गैर-निर्वाचित व्यक्ति ने बिना अधिकार के प्रशासनिक निर्देश दिए, सरकारी कार्यों में हस्तक्षेप किया अथवा ऐसी भूमिका निभाई जो उसके लिए निर्धारित नहीं थी, तो संबंधित नियमों के अनुसार कार्रवाई का प्रश्न उठ सकता है।
वहीं यदि जांच में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिलता, तो संबंधित व्यक्ति पर लगाए जा रहे आरोपों अथवा चर्चाओं को भी उसी आधार पर देखा जाना चाहिए।
अब दस्तावेज बताएंगे—हकीकत क्या है?
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण चीज फिलहाल दस्तावेज और तथ्य हैं।
यदि राकेश जायसवाल को किसी सरकारी कार्य के निरीक्षण अथवा किसी अन्य भूमिका के लिए अधिकृत किया गया है, तो वह आदेश स्थिति स्पष्ट कर सकता है। यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है, तो प्रशासन से यह जानना उचित होगा कि उनकी भूमिका को किस रूप में स्वीकार किया गया।
यही निष्पक्ष जांच का आधार भी होना चाहिए।
क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित पदाधिकारी की जिम्मेदारी और गैर-निर्वाचित व्यक्ति की व्यक्तिगत भूमिका के बीच स्पष्ट सीमा होना आवश्यक है। साथ ही किसी व्यक्ति पर केवल रिश्तेदारी या मौके पर मौजूदगी के आधार पर प्रशासनिक हस्तक्षेप का निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं है।
इसलिए फिलहाल सवाल आरोप का नहीं, अधिकार का है।
अगर अधिकार है तो आदेश सामने आए, अगर भूमिका है तो उसका स्वरूप स्पष्ट हो और अगर कोई अनियमितता सामने आती है तो जांच के आधार पर जिम्मेदारी तय हो।
कुशीनगर नगर पालिका में चल रही जांच से उम्मीद की जा रही है कि इन सवालों का जवाब तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर सामने आएगा। संबंधित पक्ष का पक्ष भी इस मामले में महत्वपूर्ण है और उसे सामने आने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
विलेज फास्ट टाइम्स इस प्रकरण में उपलब्ध दस्तावेजों और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर आगे भी तथ्यात्मक स्थिति अपने पाठकों तक पहुंचाता रहेगा।
