
विलेज फास्ट टाइम्स न्यूज नेटवर्क, गोरखपुर। आरक्षण व्यवस्था में सुधार, प्रस्तावित यूजीसी प्रावधानों पर पुनर्विचार, एससी/एसटी एक्ट के कथित दुरुपयोग को रोकने तथा सवर्ण आयोग के गठन की मांग को लेकर गोरखपुर में आयोजित “भारत समानता-न्याय संकल्प पदयात्रा” में राष्ट्रीय सर्व जनकल्याण संकल्प पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. कुलदीप पाण्डेय ने सहभागिता दर्ज कराई। गोरखपुर विश्वविद्यालय के निकट पंत पार्क से शुरू हुई पदयात्रा में विभिन्न संगठनों और सामाजिक समूहों से जुड़े लोग शामिल हुए और अपनी मांगों को लेकर सरकार तक आवाज पहुंचाई।
पदयात्रा के दौरान प्रदर्शनकारियों ने कहा कि देश में सामाजिक न्याय के साथ सभी वर्गों के युवाओं और छात्रों को समान अवसर मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि वर्तमान नीतियों और कुछ कानूनी प्रावधानों को लेकर समाज के एक वर्ग में असंतोष है, जिस पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
मीडिया से बातचीत में डॉ. कुलदीप पाण्डेय ने तीखे शब्दों में कहा कि सरकार को केवल नारे और आश्वासन की राजनीति से आगे बढ़कर समाज में व्याप्त असंतोष और युवाओं की वास्तविक चिंताओं का समाधान करना होगा। उन्होंने आरक्षण व्यवस्था को आर्थिक आधार से जोड़ने अथवा उसमें व्यापक सुधार करने की मांग उठाई। साथ ही यूजीसी के प्रस्तावित प्रावधानों को वापस लेने और एससी/एसटी एक्ट के कथित दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक संशोधन की मांग की।
उन्होंने कहा कि पार्टी संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के दायरे में रहकर जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाती रहेगी। पार्टी संरक्षक पंडित बृजेश पाण्डेय ज्योतिषाचार्य के निर्देशानुसार पदयात्रा में शामिल हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सवर्ण समाज की मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण ढंग से अपनी सहभागिता दर्ज कराई।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में जातिगत आरक्षण के स्थान पर आर्थिक आधार पर व्यवस्था लागू करने अथवा वर्तमान व्यवस्था की समीक्षा, प्रस्तावित यूजीसी प्रावधानों पर पुनर्विचार, एससी/एसटी एक्ट के कथित दुरुपयोग को रोकने तथा सवर्ण समाज के हितों के लिए आयोग गठित करने की मांग शामिल रही।
डॉ. कुलदीप पाण्डेय ने साफ चेतावनी दी कि यदि सरकार इन मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करती है तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। हालांकि प्रशासन की ओर से इस पदयात्रा और मांगों पर समाचार लिखे जाने तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। अब सवाल यह है कि सरकार और प्रशासन इन उठती आवाजों को संवाद के जरिए शांत करेगा या फिर मांगों की अनदेखी एक बड़े जनआंदोलन की जमीन तैयार करेगी।
