
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। रसोई गैस आम आदमी की जरूरत है या कमाई का खुला जरिया? जनपद कुशीनगर में घरेलू गैस सिलेंडर वितरण को लेकर उठ रहे सवाल अब सीधे प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली पर कटाक्ष करते नजर आ रहे हैं। उपभोक्ताओं का आरोप है कि गैस एजेंसियां निर्धारित दर से अधिक रकम वसूल रही हैं और जिम्मेदार विभाग आंख मूंदे बैठा है।
बताया जा रहा है कि घरेलू गैस सिलेंडर का निर्धारित मूल्य 987.50 रुपये है, लेकिन कई स्थानों पर उपभोक्ताओं से 1010 रुपये तक लिए जा रहे हैं। यानी हर सिलेंडर पर 22 रुपये 50 पैसे की अतिरिक्त वसूली। सुनने में रकम छोटी लग सकती है, लेकिन जब इसी गणित को हजारों सिलेंडरों पर बैठाया जाता है तो मामला कथित तौर पर लाखों रुपये के खेल में बदलता दिखाई देता है।
जानकारों के अनुसार एक ट्रक में करीब 400 घरेलू सिलेंडर आते हैं, जिनमें लगभग 300 सिलेंडरों का वितरण होता है। यदि प्रति सिलेंडर साढ़े बाइस रुपये अतिरिक्त लिए जाएं तो एक ट्रक से करीब 6750 रुपये की अतिरिक्त रकम निकलती है। महीने में औसतन 25 ट्रकों की आपूर्ति और हजारों सिलेंडरों के वितरण का आंकड़ा जोड़ा जाए तो कथित अतिरिक्त वसूली का अनुमान 1.80 लाख रुपये प्रतिमाह तक पहुंचने की चर्चा है।
उपभोक्ताओं का कहना है कि गैस एजेंसियां “होम डिलीवरी”, “ढुलाई”, “मजदूरी” और “खर्चा” जैसे शब्दों का हवाला देकर अतिरिक्त रकम मांगती हैं, जबकि नियमों के मुताबिक निर्धारित मूल्य में यह सब शामिल माना जाता है। सबसे बड़ा आरोप यह है कि अतिरिक्त रकम लेने के बावजूद कई मामलों में कोई अलग रसीद नहीं दी जाती। सवाल यह है कि अगर सब कुछ नियम के तहत है तो फिर भुगतान का पारदर्शी हिसाब उपभोक्ताओं से क्यों छिपाया जाता है?
ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के उपभोक्ता खुलकर बोलने से भी बचते दिख रहे हैं। वजह साफ है—“बहस करो तो अगली बार सिलेंडर देर से मिलेगा” जैसी आशंकाएं। नतीजा यह कि लोग मजबूरी में अतिरिक्त रकम देकर चुप्पी साध लेते हैं। मगर महंगाई की मार झेल रहे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए हर सिलेंडर पर 20-25 रुपये भी कम चोट नहीं है।
अब सवाल सीधे जिला पूर्ति विभाग और प्रशासन के दरवाजे पर खड़ा है। क्या संबंधित अधिकारियों को इस कथित वसूली की जानकारी नहीं? और यदि जानकारी है, तो कार्रवाई का पहिया आखिर किस फाइल में फंसा हुआ है? क्या रेट सूची सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए है या उसका पालन भी कराया जाएगा?
उपभोक्ताओं ने जिला प्रशासन, पूर्ति विभाग और तेल कंपनियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि प्रत्येक डिलीवरी वाहन पर रेट सूची अनिवार्य रूप से चस्पा हो, उपभोक्ताओं को पूर्ण भुगतान की रसीद दी जाए और यदि अतिरिक्त वसूली सिद्ध होती है तो संबंधित एजेंसियों पर कड़ी कार्रवाई हो।
फिलहाल कुशीनगर में चर्चा यही है—“सिलेंडर तो घर पहुंच रहा है, लेकिन उसके साथ उपभोक्ताओं की जेब भी हल्की हो रही है।” अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस कथित खेल पर गैस की तरह उड़ जाता है या जांच की आंच सचमुच कहीं जलती भी है।
