
जनगणना की बुनियाद में सेंध या कागजी खेल? पडरौना तहसील में HLB सीमांकन पर बड़ा सवाल, एक गांव के घर दूसरे गांव में पहुंचाए गए!
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक कवायद मानी जाने वाली राष्ट्रीय जनगणना की तैयारियों के बीच कुशीनगर जिले की पडरौना तहसील से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह केवल एक तकनीकी चूक नहीं बल्कि प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती नजर आ रही है। आरोप है कि हाउस लिस्टिंग ब्लॉक (एचएलबी) सीमांकन में ऐसी गड़बड़ियां की गई हैं कि गांवों का भूगोल ही कागजों में बदल डाला गया है। कहीं एक गांव के मकान दूसरे गांव में चढ़ा दिए गए हैं तो कहीं जंगल को दूसरी ग्राम सीमा में दिखा दिया गया है।
सूत्रों की मानें तो गोपालपुर-धीरपट्टी, हरका घूरमल-सिधुआ, हरका घूरमल-मोतीलहा, हिरनाहा-सिधवा तथा सुखपुरा-बनवीरपुर जैसे गांवों के बीच एचएलबी कटान में भारी ओवरलैप की शिकायतें सामने आई हैं। इतना ही नहीं, जंगल बनवीरपुर क्षेत्र को बसहिया के हिस्से में दर्शाने की चर्चा ने ग्रामीणों और जनगणना कर्मियों दोनों को उलझन में डाल दिया है।
अब सवाल उठ रहा है—क्या गांवों की सीमाएं सचमुच बदल गईं, या फिर कागजों में बैठकर तैयार की गई रिपोर्टों ने पूरे भूगोल को ही नया रूप दे दिया?
बिना मौके पर गए तैयार कर दी रिपोर्ट?
ग्रामीणों और जनगणना कार्य में लगे कर्मियों का आरोप है कि कई स्थानों पर एचएलबी सीमांकन केवल नक्शों और पुराने अभिलेखों के भरोसे कर दिया गया। जमीनी सत्यापन को दरकिनार कर कागजी सीमाओं का ऐसा जाल बुना गया कि वास्तविकता उससे कोसों दूर दिखाई पड़ रही है।

जनगणना कार्य से जुड़े कुछ कर्मियों का कहना है कि जब वे घर-घर सर्वे के लिए गांवों में पहुंचे तो उन्हें समझने में घंटों लग गए कि संबंधित मकान आखिर किस हाउस लिस्टिंग ब्लॉक में दर्ज है। कागज कुछ और बता रहे हैं, जमीन कुछ और।
ग्रामीणों की नाराजगी भी कम नहीं है। उनका कहना है कि जिन घरों का वर्षों से एक गांव में रिकॉर्ड रहा, वे अचानक दूसरे गांव के एचएलबी में कैसे पहुंच गए? यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में ग्रामीण पहचान, प्रशासनिक रिकॉर्ड और विकास योजनाओं तक पर संकट खड़ा हो सकता है।
स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि अगर सीमांकन से पहले जिम्मेदार लेखपाल मौके पर जाकर निरीक्षण करते, गांवों की वास्तविक सीमा समझते और स्थल सत्यापन कराते, तो ऐसी विसंगतियां पैदा ही नहीं होतीं।
सिर्फ जनगणना नहीं, भविष्य के आंकड़ों का सवाल
मामला केवल घर गिनने तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार जनगणना देश की प्रशासनिक रीढ़ मानी जाती है। इसी के आधार पर मतदाता सूची, सामाजिक व जातीय आंकड़े, पंचायत सीमांकन, सरकारी योजनाएं, सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास की नीतियां तैयार होती हैं।
ऐसे में यदि हाउस लिस्टिंग ब्लॉक की बुनियाद ही गलत सीमांकन पर टिकेगी तो आने वाले वर्षों में आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
सोचिए, अगर किसी गांव की आबादी कागजों में कम या ज्यादा दर्ज हो जाए, यदि घरों की संख्या गलत ब्लॉक में चली जाए, तो क्या भविष्य में योजनाओं का वितरण भी प्रभावित नहीं होगा? क्या पंचायतों का गणित, आरक्षण की तस्वीर और मतदाता आंकड़े विवादों में नहीं फंस सकते?
यही कारण है कि यह मामला अब महज एक तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा बनता जा रहा है।
अधिकारियों की निगरानी पर उठे सवाल
सबसे बड़ा सवाल निगरानी व्यवस्था को लेकर उठ रहा है। जनगणना जैसा राष्ट्रीय महत्व का कार्य चल रहा हो और फील्ड स्तर पर ऐसी शिकायतें सामने आएं, तो निरीक्षण और सत्यापन की जिम्मेदारी किसकी थी?
क्या संबंधित अधिकारियों ने एचएलबी कटान का क्रॉस सत्यापन कराया? क्या सीमांकन रिपोर्टों का स्थलीय परीक्षण हुआ? या फिर पूरा काम फाइलों और नक्शों के सहारे निपटा दिया गया?
ग्रामीणों का आरोप है कि जमीनी सच्चाई से दूर बैठकर तैयार किए गए सीमांकन ने गांवों को उलझन में डाल दिया है। कई लोग यह तक कह रहे हैं कि “कागजों में गांवों की पहचान बदल दी गई, अब प्रशासन बताए कि असली गांव कौन सा है और नक्शे वाला कौन?”
जनता के बीच यह चर्चा भी तेज हो रही है कि यदि जनगणना की शुरुआती तैयारी में ही इतनी अव्यवस्था दिखाई दे रही है, तो अंतिम आंकड़ों की प्रमाणिकता पर कैसे भरोसा किया जाए?
चुनावी गणित पर भी पड़ सकता है असर?
मामले को जानकार केवल प्रशासनिक भूल मानकर छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि गलत सीमांकन भविष्य में चुनावी समीकरणों तक को प्रभावित कर सकता है। क्योंकि जनसंख्या आधारित आंकड़े कई प्रशासनिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं में आधार का काम करते हैं।
अगर गांवों की आबादी, घरों की संख्या और भू-सीमा रिकॉर्ड में गड़बड़ हो जाए तो पंचायत स्तर से लेकर बड़े प्रशासनिक निर्णयों तक असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि पडरौना तहसील में एचएलबी कटान को लेकर उठे सवाल अब धीरे-धीरे गंभीर बहस का विषय बनते जा रहे हैं।
जांच और कार्रवाई की मांग तेज
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि सभी ओवरलैप क्षेत्रों का दोबारा स्थलीय सत्यापन कराया जाए, वास्तविक सीमाओं का पुनर्निर्धारण हो और जहां लापरवाही साबित हो वहां जिम्मेदार लेखपालों व संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
लोगों का कहना है कि जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्य में किसी भी स्तर की चूक भविष्य के लिए भारी पड़ सकती है। इसलिए इसे मामूली प्रशासनिक भूल बताकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। सवाल साफ है—क्या पडरौना तहसील में गांवों का बदला हुआ यह “कागजी भूगोल” सुधारा जाएगा, या फिर आने वाले वर्षों की सरकारी योजनाएं, आंकड़े और प्रशासनिक फैसले इसी उलझे हुए सीमांकन के सहारे चलते रहेंगे?
क्योंकि जब गांवों की पहचान ही कागजों में बदलने लगे, तब केवल सीमाएं नहीं बदलतीं… भरोसा भी दरकने लगता है।
