
हर साल नया लक्ष्य, लेकिन पुराने पौधों का हिसाब गायब; आखिर वृक्षारोपण हुआ या सिर्फ़ कागज़ी हरियाली?
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर। विशेष संवाददाता
कुशीनगर में एक बार फिर वृक्षारोपण महाअभियान की तैयारियां ज़ोरों पर हैं। विभागों को लक्ष्य सौंप दिए गए हैं, पौधशालाओं से पौधे निकलने लगे हैं और कुछ ही दिनों में 45 लाख 17 हजार पौधे लगाने का सरकारी दावा भी सामने आ जाएगा। लेकिन इस बार माहौल पहले जैसा नहीं है। अब जनता पौधे लगाने की संख्या नहीं, बल्कि पिछले वर्षों में लगाए गए पौधों का हिसाब मांग रही है।
लगातार सामने आ रही खबरों और सवालों ने वन विभाग के दावों पर नई बहस छेड़ दी है। बीते वर्षों में लाखों पौधे लगाने के सरकारी दावे किए गए, लेकिन ज़मीनी हकीकत उन दावों से मेल नहीं खाती दिखाई देती। यदि तीन वर्षों में एक करोड़ बीस लाख से अधिक पौधे वास्तव में लगाए गए हैं, तो जिले में हरियाली का विस्तार साफ़ दिखाई देना चाहिए था। लेकिन गांवों से लेकर सड़कों, नहरों, ग्राम समाज की भूमि और सार्वजनिक स्थलों तक ऐसी तस्वीर बहुत कम नज़र आती है, जिससे करोड़ों पौधों के अस्तित्व का एहसास हो।
आंकड़े बढ़ते रहे, हरियाली नहीं
सरकारी अभिलेख बताते हैं कि वर्ष 2024 में 37.42 लाख, वर्ष 2025 में 39.72 लाख और वर्ष 2026 में 45.17 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यानी तीन वर्षों में एक करोड़ बीस लाख से अधिक पौधरोपण का दावा।
यदि ये पौधे जीवित होते, तो कुशीनगर की पहचान हरियाली से होती। मगर कई ऐसे गांव, जिनके नाम में ही “जंगल” जुड़ा है, आज भी घने वृक्षों के बजाय खाली ज़मीन और बिखरी हरियाली की तस्वीर पेश कर रहे हैं। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर करोड़ों पौधे गए कहां?
जुलाई में अभियान, फिर खामोशी
हर वर्ष जुलाई आते ही पौधरोपण अभियान उत्सव का रूप ले लेता है। अधिकारियों के हाथों पौधे लगाए जाते हैं, फोटो खिंचती हैं, प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं और लक्ष्य पूरा होने के दावे किए जाते हैं। लेकिन कुछ महीनों बाद शायद ही कोई यह देखने लौटता है कि लगाए गए पौधों में से कितने जीवित बचे।
क्या उन्हें समय पर पानी मिला? क्या उनकी सुरक्षा हुई? क्या वे पेड़ बन पाए? इन सवालों का जवाब सरकारी फाइलों में भी आसानी से नहीं मिलता।
करोड़ों रुपये खर्च, जिम्मेदारी किसकी?
वृक्षारोपण पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। पौधों की खरीद, गड्ढों की खुदाई, परिवहन और संरक्षण पर सरकारी धन लगाया जाता है। लेकिन यदि वही पौधे कुछ समय बाद सूख जाएं, तो किसी अधिकारी या संबंधित विभाग की जवाबदेही तय नहीं होती।
यदि किसी सरकारी निर्माण के खराब होने पर जांच और कार्रवाई हो सकती है, तो फिर लाखों पौधों के नष्ट होने पर जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती? यह सवाल व्यवस्था की पारदर्शिता पर सीधा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
सर्वाइवल रेट सार्वजनिक क्यों नहीं?
वन विभाग हर वर्ष पौधरोपण के आंकड़े तो जारी करता है, लेकिन यह शायद ही बताया जाता है कि उनमें से कितने पौधे आज भी जीवित हैं। आखिर सर्वाइवल रेट सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?
यदि पौधों की संख्या और उनकी स्थिति संतोषजनक है, तो जनता को यह जानकारी देने में संकोच कैसा? और यदि स्थिति विपरीत है, तो क्या हर साल केवल लक्ष्य पूरा करना ही सफलता मान लिया जाता है?
डीएफओ साहब, जनता जवाब चाहती है
अब सवाल सीधे वन विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों से हैं—पिछले तीन वर्षों में लगाए गए पौधों में से कितने आज जीवित हैं? कितने पौधे वृक्ष बन चुके हैं? उनके संरक्षण पर कितना धन खर्च हुआ? कितने स्थानों का भौतिक सत्यापन कराया गया? सूख चुके पौधों की जिम्मेदारी किस पर तय हुई? और क्या इस वर्ष भी केवल पौधे लगाकर फाइल बंद कर दी जाएगी?
जब तक इन सवालों के स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब सामने नहीं आते, तब तक करोड़ों पौधों के दावे संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल पाएंगे।
पर्यावरण केवल लक्ष्य पूरा करने से नहीं बचता, बल्कि पौधों को जीवित रखकर पेड़ बनाने से बचता है। इसलिए अब समय केवल नए पौधे लगाने का नहीं, बल्कि पुराने पौधों का हिसाब देने का भी है। क्योंकि जनता अब आंकड़ों से नहीं, ज़मीन पर दिखने वाली हरियाली से संतुष्ट होगी।
