
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर
विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जनपद के सेवरही विद्युत वितरण खंड में करोड़ों रुपये की लागत से कराए गए विकास कार्यों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। क्षेत्र में अचानक तेज हुई विद्युत निर्माण गतिविधियों ने पूरे मामले को नए मोड़ पर ला दिया है। स्थानीय लोगों का दावा है कि जिन कार्यों को विभागीय अभिलेखों में पहले ही पूर्ण दर्शाकर भुगतान किए जाने की चर्चा थी, वही कार्य अब तेजी से धरातल पर कराए जा रहे हैं। इस घटनाक्रम ने विभागीय कार्यप्रणाली, भुगतान प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था पर सवालों की लंबी श्रृंखला खड़ी कर दी है।
सूत्रों के अनुसार बिजनेस प्लान 2023-24 एवं 2024-25 के तहत ट्रांसफार्मर क्षमता वृद्धि, नए ट्रांसफार्मरों की स्थापना, लाइन विस्तार तथा अन्य विद्युत परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर भुगतान किए जाने की चर्चाएं पहले से होती रही हैं। अब क्षेत्र के कई गांवों में अचानक मजदूरों, मशीनों और विद्युत सामग्री की आवाजाही बढ़ने से यह सवाल और गहरा गया है कि यदि कार्य पहले ही पूरे हो चुके थे तो अब इतनी जल्दबाजी में इन्हें पूरा कराने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।

ग्रामीणों का कहना है कि जिन स्थानों पर लंबे समय से कोई कार्य दिखाई नहीं दिया था, वहां अब लगातार पोल लगाए जा रहे हैं, ट्रांसफार्मर स्थापित किए जा रहे हैं और लाइन विस्तार का कार्य चल रहा है। लोगों का मानना है कि मीडिया में मामला प्रमुखता से सामने आने के बाद विभाग और संबंधित कार्यदायी संस्था सक्रिय हुई है।
सबसे बड़ा प्रश्न भुगतान प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है। सरकारी नियमों के अनुसार किसी भी निर्माण कार्य का भुगतान तभी किया जाता है जब संबंधित अधिकारी स्थल निरीक्षण कर कार्य की गुणवत्ता और पूर्णता की पुष्टि करें। इसके बाद माप पुस्तिका (एमबी), कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र तथा अन्य अभिलेखों के आधार पर भुगतान स्वीकृत होता है। ऐसे में यदि अब कार्य कराए जा रहे हैं तो यह स्वाभाविक प्रश्न है कि पहले जारी की गई करोड़ों रुपये की धनराशि आखिर किस आधार पर स्वीकृत की गई थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भुगतान से पहले निरीक्षण हुआ था तो अधूरे कार्यों को पूर्ण कैसे मान लिया गया। और यदि निरीक्षण नहीं हुआ था तो यह वित्तीय प्रक्रिया की गंभीर चूक मानी जाएगी। दोनों ही परिस्थितियों में जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है।
पूरे प्रकरण में संबंधित कार्यदायी कंपनी की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी हुई है। क्षेत्र में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि यदि कंपनी ने निर्धारित समय पर सभी कार्य पूरे कर दिए थे तो अब दोबारा इतनी तेजी से कार्य क्यों कराए जा रहे हैं। वहीं यदि कार्य अधूरे थे तो भुगतान किस आधार पर हुआ और इसकी जवाबदेही किसकी है। इन सवालों का अब तक कोई स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आया है।
हैरानी की बात यह भी है कि इतने गंभीर आरोपों और चर्चाओं के बावजूद अब तक किसी अधिकारी के विरुद्ध सार्वजनिक रूप से कोई ठोस विभागीय कार्रवाई सामने नहीं आई है। न ही यह स्पष्ट किया गया है कि भुगतान की प्रक्रिया की जांच किस स्तर पर हो रही है और न ही यह बताया गया है कि संबंधित अभिलेखों का सत्यापन कराया गया है या नहीं।
प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष तकनीकी एवं वित्तीय जांच कराई जानी चाहिए। जांच में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि जिन कार्यों का भुगतान हुआ, उनकी वास्तविक स्थिति क्या थी, निरीक्षण किस अधिकारी ने किया, कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र किसने जारी किया तथा भुगतान की अंतिम स्वीकृति किस स्तर से दी गई।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि सरकारी धन का उपयोग नियमानुसार हुआ है तो विभाग को पूरे मामले की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। वहीं यदि कहीं अनियमितता हुई है तो दोषी अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां दोबारा उत्पन्न न हों।
फिलहाल सेवरही विद्युत वितरण खंड में तेजी से चल रहे कार्यों ने पूरे मामले को और अधिक चर्चाओं में ला दिया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन और उच्च अधिकारी इस प्रकरण का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराते हैं या नहीं। सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है जो आम जनता पूछ रही है—यदि काम आज कराया जा रहा है तो करोड़ों रुपये का भुगतान पहले आखिर किस आधार पर किया गया?
अब यह मामला केवल विकास कार्यों का नहीं, बल्कि सरकारी धन के उपयोग, जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता की परीक्षा बन चुका है।
