
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर। विशेष संवाददाता
कुशीनगर का सहकारिता विभाग इन दिनों ऐसे सवालों के घेरे में है, जिनके जवाब तलाशना अब जरूरी हो गया है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि जहां शासन का उद्देश्य जिम्मेदारियों का समान वितरण और किसानों को समयबद्ध सेवाएं उपलब्ध कराना है, वहीं जिले में एक सचिव के इर्द-गिर्द पूरा सहकारिता तंत्र सिमटता दिखाई दे रहा है। आरोप है कि एक ही व्यक्ति को इतनी समितियों और संघों का प्रभार सौंप दिया गया है कि अब लोग उन्हें विभाग का ‘सुपर सचिव’ कहने लगे हैं।
सूत्रों के मुताबिक सचिव शशि प्रकाश राय की मूल तैनाती कोटवा लोहझर समिति में है, लेकिन इसके अलावा कसया क्षेत्र की मैनपुर, नौगावां, कानखोरिया और नरकटिया समितियों के साथ फाजिलनगर की पोखरभिंडा तथा हाटा की ढाढ़ा समिति का प्रभार भी उन्हीं के पास होने की चर्चा है। इतना ही नहीं, हाटा, नैकाछपरा और अहिरौली संघों के संचालन की जिम्मेदारी भी उन्हीं के हाथों में बताई जा रही है। यदि यह स्थिति सही है तो बड़ा सवाल यह है कि क्या पूरे जिले में सचिवों का अकाल पड़ गया है, या फिर किसी खास व्यक्ति पर विभाग की असाधारण मेहरबानी बरस रही है?
जानकारों का कहना है कि अतिरिक्त प्रभार देना असामान्य नहीं है, लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। जब एक ही अधिकारी के पास कई समितियों और संघों की जिम्मेदारी केंद्रित हो जाए तो पारदर्शिता, जवाबदेही और कार्यकुशलता तीनों प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है। किसानों तक खाद, बीज, ऋण और सहकारी योजनाओं का लाभ समय पर पहुंचे, इसके लिए प्रत्येक समिति की सक्रियता आवश्यक है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या इतनी जिम्मेदारियों के बीच हर समिति को बराबर समय और ध्यान मिल पा रहा है?
मामले में सचिव शशि प्रकाश राय का पक्ष जानने के लिए उनके मोबाइल पर कई बार संपर्क किया गया, लेकिन शुरुआत में फोन रिसीव नहीं हुआ। इसके बाद सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक (एआर) नीरज कुमार गोंड से बातचीत की गई। उन्होंने कर्मचारियों की कमी का हवाला देते हुए स्वीकार किया कि वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अतिरिक्त प्रभार दिए गए हैं। हालांकि जब उनसे पूछा गया कि क्या यह व्यवस्था शासनादेश और नियमों के अनुरूप है, तो उनका जवाब था कि “यह पूरी तरह नियमसंगत नहीं है, लेकिन पहले से ऐसा चलता आ रहा है।”
कुछ देर बाद सचिव शशि प्रकाश राय ने स्वयं फोन कर कहा कि उनके पास केवल दो समितियों का प्रभार है, जबकि अन्य समितियों का कार्य लिपिक देख रहा है। बाद में उन्होंने दोबारा फोन कर पत्रकार को कसया आकर मिलने की बात कही।
उधर विभागीय हलकों में यह चर्चा भी है कि संबंधित सचिव कसया सहकारी बैंक परिसर में ही रहकर कार्य करते हैं। ऐसे में सवाल और गहरा हो गया है कि क्या विभाग की पूरी व्यवस्था कुछ चुनिंदा लोगों के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है? यदि नियमों के विपरीत प्रभार दिए गए हैं तो इसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की है, और यदि सब कुछ नियमों के तहत हुआ है तो संबंधित आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे?
अब यह मामला केवल एक सचिव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। विलेज फास्ट टाइम्स किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता, लेकिन जनता और किसानों के हित में यह जरूर पूछता है कि क्या सहकारिता व्यवस्था नियमों से चलेगी या रसूख से? अब निगाहें विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर हैं कि वे इन सवालों का तथ्यात्मक जवाब देते हैं या फिर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक स्थिति जनता के सामने लाते
