
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर। विशेष संवाददाता
कुशीनगर के जिला प्रोबेशन कार्यालय में हुई आउटसोर्सिंग भर्ती अब महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन की परीक्षा बनती जा रही है। भर्ती प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि होने के बावजूद जिम्मेदारों पर कार्रवाई न होना कई सवाल खड़े कर रहा है। जांच रिपोर्ट सामने आने के लगभग 20 दिन बाद भी न तो विवादित चयन प्रक्रिया निरस्त की गई और न ही किसी अधिकारी के विरुद्ध कोई दंडात्मक कदम उठाया गया। इससे पूरे मामले को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है और भर्ती की निष्पक्षता पर सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं।

जानकारी के अनुसार शिकायतकर्ता अभिषेक कुमार यादव ने पूरे प्रकरण को लेकर मंडलायुक्त गोरखपुर का दरवाजा खटखटाया है। अपने शिकायती पत्र में उन्होंने मांग की है कि विवादित चयन प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए, पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, दोषी अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित अन्य प्रासंगिक धाराओं में एफआईआर दर्ज हो तथा यदि अनियमित भुगतान हुआ है तो उसकी रिकवरी भी सुनिश्चित की जाए।
मामले की सबसे अहम कड़ी अपर जिलाधिकारी (न्यायिक) की जांच रिपोर्ट मानी जा रही है। शिकायत के आधार पर कराई गई जांच में भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने पूरी चयन प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए। रिपोर्ट के अनुसार भर्ती प्रक्रिया में शासनादेशों का पूर्णतः पालन नहीं किया गया। आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ाने से लेकर अभ्यर्थियों के चयन तक कई स्तरों पर नियमों की अनदेखी किए जाने की बात सामने आई।

जांच में यह भी उल्लेखित किया गया कि एक पद के लिए कम से कम पांच अभ्यर्थियों को साक्षात्कार का अवसर दिए जाने का स्पष्ट प्रावधान था, लेकिन 174 आवेदन प्राप्त होने के बावजूद कई पदों पर सीमित और चुनिंदा अभ्यर्थियों को ही इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सभी पात्र अभ्यर्थियों को समान अवसर मिला, अथवा चयन प्रक्रिया पहले से तय परिणामों की ओर बढ़ रही थी।
सबसे चौंकाने वाला तथ्य उस समय सामने आया जब जांच के दौरान यह पाया गया कि जिला मैनेजर/कोऑर्डिनेटर जैसे महत्वपूर्ण पद पर चयनित अभ्यर्थी के आवेदन से संबंधित आवश्यक अभिलेख ही उपलब्ध नहीं मिले। यदि आवेदन पत्र और आवश्यक दस्तावेज रिकॉर्ड में मौजूद नहीं हैं, तो फिर चयन किस आधार पर किया गया? यही वह प्रश्न है जिसने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। प्रशासनिक गलियारों में अब यही चर्चा है कि आखिर बिना अभिलेखों के चयन कैसे संभव हुआ और इसकी जवाबदेही किसकी है।

जांच के दौरान एक और तथ्य ने विवाद को और गहरा कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार चयनित 10 अभ्यर्थियों में से 8 एक ही जाति से संबंधित पाए गए। शिकायतकर्ता ने इसे भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल बताते हुए आरोप लगाया है कि योग्यता और मेरिट की अपेक्षा पक्षपात तथा भाई-भतीजावाद को प्राथमिकता दी गई। हालांकि इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष सक्षम प्राधिकारी द्वारा ही तय किया जाएगा, लेकिन जांच में सामने आए तथ्यों ने पूरे चयन को संदेह के घेरे में ला दिया है।
अपर जिलाधिकारी (न्यायिक) ने अपनी जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से चयन प्रक्रिया की पुनर्समीक्षा कराए जाने की आवश्यकता जताई थी। इसके बावजूद अब तक प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया। यही कारण है कि शिकायतकर्ता सहित कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि यदि जांच में विसंगतियों की पुष्टि हो चुकी है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? और यदि कार्रवाई नहीं करनी थी, तो फिर जांच का उद्देश्य क्या था?
शिकायतकर्ता अभिषेक कुमार यादव ने मंडलायुक्त गोरखपुर से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराकर विवादित भर्ती को निरस्त किया जाए, दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए तथा सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता और जनता के विश्वास को बहाल करने के लिए कठोर कार्रवाई की जाए।
अब सभी की निगाहें मंडलायुक्त स्तर पर होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों और जांच रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों के आधार पर कठोर कदम उठाए जाते हैं, तो यह मामला केवल एक भर्ती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य की सरकारी चयन प्रक्रियाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है। वहीं यदि कार्रवाई में और विलंब होता है, तो प्रशासन की निष्पक्षता पर उठ रहे सवाल और भी तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।




