


21 जुलाई | विलेज फास्ट टाइम्स | विशेष संवाददाता
कुशीनगर जनपद के विकास खंड दुदही के सभागार भवन में मंगलवार को विषम-ऊसरी क्षेत्र समग्र कृषि विकास कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित कृषि गोष्ठी एवं किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों के लिए बदलते दौर की खेती का महत्वपूर्ण मार्गदर्शन साबित हुआ। बड़ी संख्या में उपस्थित किसानों के बीच कृषि विशेषज्ञों, गन्ना वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने स्पष्ट संदेश दिया कि अब केवल परंपरागत खेती के भरोसे बेहतर आय संभव नहीं है। यदि किसान समय के साथ खेती की तकनीक नहीं बदलेंगे, तो बढ़ती लागत और घटती आमदनी भविष्य में और गंभीर चुनौती बन सकती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि बदलता मौसम, मिट्टी की घटती उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती कीमत और उत्पादन लागत में लगातार वृद्धि इस बात का संकेत है कि खेती को अब वैज्ञानिक सोच और आधुनिक तकनीक से जोड़ना होगा। उन्होंने किसानों से नई कृषि पद्धतियों को अपनाने की अपील करते हुए कहा कि ज्ञान आधारित खेती ही भविष्य की मजबूत नींव बनेगी।
गोष्ठी में प्राकृतिक खेती पर विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि यह केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता है। जीवामृत, जैविक खाद और प्राकृतिक पोषक तत्वों के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है, उत्पादन क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है तथा खेती अधिक टिकाऊ बनती है। साथ ही चेताया गया कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से भूमि की उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
गन्ना वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि अधिक उत्पादन केवल अधिक खाद डालने से नहीं मिलता, बल्कि उन्नत प्रजातियों के चयन, समय पर बुवाई, संतुलित सिंचाई, रोग एवं कीट नियंत्रण तथा वैज्ञानिक फसल प्रबंधन से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं। उन्होंने आधुनिक कृषि यंत्रों के उपयोग पर भी बल दिया, जिससे कम लागत में अधिक उत्पादन हासिल किया जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान किसानों को फार्मर रजिस्ट्री, सॉइल हेल्थ कार्ड, कृषि यंत्रीकरण, उन्नत बीज, संतुलित उर्वरक प्रयोग तथा विभिन्न सरकारी कृषि योजनाओं की विस्तृत जानकारी दी गई। अधिकारियों ने कहा कि योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब किसान समय पर पंजीकरण कर नई तकनीकों और सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाएंगे।
कृषि अधिकारियों ने कहा कि आज खेती केवल मेहनत का नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और तकनीक का क्षेत्र बन चुकी है। जो किसान सीखने, समझने और बदलाव को अपनाने के लिए तैयार रहेगा, वही भविष्य में आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से अधिक मजबूत बन सकेगा।
कार्यक्रम के दौरान किसानों ने अपनी समस्याएं भी खुलकर रखीं, जिनका विशेषज्ञों ने समाधान बताया। किसानों ने मांग की कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाएं, ताकि उन्हें नई कृषि तकनीकों और सरकारी योजनाओं की लगातार जानकारी मिलती रहे।
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि यदि प्राकृतिक खेती, वैज्ञानिक तकनीक और सरकारी योजनाओं का प्रभावी लाभ किसानों तक पहुंचाया गया, तो विषम-ऊसरी और बंजर भूमि भी दोबारा उपजाऊ बन सकती है। साथ ही गन्ना उत्पादन, किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है।
संदेश स्पष्ट था— खेती में बदलाव अब विकल्प नहीं, बल्कि समय की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।
