
विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार लगातार सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों में पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का दावा करती रही है। लेकिन कुशीनगर नगर पालिका परिषद के वार्ड संख्या-13 स्थित गोला बाजार सब्जी मंडी के सौंदर्यीकरण कार्य ने इन दावों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चा का केंद्र बना है वह शिलापट्ट, जिस पर मुख्यमंत्री से लेकर सांसद, विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष, सभासद और अधिकारियों के नाम तो बड़े अक्षरों में दर्ज हैं, लेकिन जिस सरकारी धन से यह निर्माण कराया गया, उसकी लागत और निर्माण का क्षेत्रफल पूरी तरह गायब है।
स्थानीय लोगों और सूत्रों के अनुसार इस सौंदर्यीकरण कार्य पर करीब 85 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। यदि यह दावा सही है, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जनता के टैक्स के पैसे से कराए गए निर्माण की लागत को सार्वजनिक करने से आखिर नगर पालिका प्रशासन क्यों बच रहा है? क्या यह केवल एक प्रशासनिक चूक है, या फिर इसके पीछे कोई ऐसा कारण है जिसे सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहता?
नाम चमकाने की होड़, हिसाब बताने में खामोशी
गोला बाजार सब्जी मंडी में लगाए गए शिलापट्ट को देखने वाला हर व्यक्ति सबसे पहले नेताओं और अधिकारियों के नाम पढ़ता है। मुख्यमंत्री, नगर विकास मंत्री, सांसद, विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष, सभासद, अधिशासी अधिकारी, अवर अभियंता और ठेकेदार तक के नाम प्रमुखता से अंकित किए गए हैं। लेकिन जिस जानकारी का सीधा संबंध जनता के धन से है—निर्माण की स्वीकृत लागत, कार्य का क्षेत्रफल, लंबाई और चौड़ाई—उसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है।
यही तथ्य नगर पालिका की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहा है। आखिर जनता कैसे जाने कि जिस विकास कार्य का उद्घाटन हुआ, उस पर कितना खर्च हुआ और बदले में कितना निर्माण कराया गया?
क्या छिपाना चाहती है नगर पालिका?
प्रशासनिक मामलों के जानकारों का कहना है कि सार्वजनिक निर्माण कार्यों में लागत और कार्य का विवरण पारदर्शिता का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इससे आम नागरिक सरकारी खर्च की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और विकास कार्यों की गुणवत्ता तथा वास्तविकता पर निगरानी रख सकते हैं।
ऐसे में यदि शिलापट्ट से यह जानकारी जानबूझकर हटाई गई है, तो स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा होता है कि कहीं कागजों और जमीन पर हुए कार्य में कोई अंतर तो नहीं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है, तो खर्च और क्षेत्रफल सार्वजनिक करने में आखिर संकोच किस बात का है?
पारदर्शिता की भावना पर उठे गंभीर प्रश्न
शासन की मंशा हमेशा यही रही है कि सार्वजनिक धन से होने वाले प्रत्येक विकास कार्य की जानकारी आम नागरिकों तक आसानी से पहुंचे। शिलापट्ट का उद्देश्य केवल उद्घाटन का प्रचार नहीं, बल्कि जनता को यह बताना भी होता है कि उनके पैसे से कौन-सा कार्य, कितनी लागत से और किस एजेंसी द्वारा कराया गया।
ऐसे में यदि केवल जनप्रतिनिधियों के नाम प्रदर्शित किए जाएं और वित्तीय जानकारी पूरी तरह गायब रहे, तो यह पारदर्शिता और जवाबदेही की भावना पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि यदि विकास कार्य पूरी तरह नियमों के अनुरूप हुआ है, तो लागत और निर्माण का विवरण सार्वजनिक करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
ईओ ने दी अपनी सफाई
इस पूरे मामले पर नगर पालिका परिषद की अधिशासी अधिकारी अंकिता शुक्ला ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि संबंधित शिलापट्ट केवल शिलान्यास और लोकार्पण के उद्देश्य से लगाए जाते हैं। उनके अनुसार सामान्यतः ऐसे शिलापट्टों पर लागत और क्षेत्रफल अंकित करने का प्रावधान नहीं होता। उन्होंने कहा कि केवल कुछ विशेष योजनाओं, जैसे स्वच्छ भारत मिशन आदि में यदि शासन की गाइडलाइन होती है, तभी लागत और क्षेत्रफल का उल्लेख किया जाता है। सामान्य विकास कार्यों में जनप्रतिनिधियों और कार्यदायी संस्था का विवरण ही दर्ज किया जाता है।
सवाल अब भी बरकरार
हालांकि अधिशासी अधिकारी की सफाई के बावजूद कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। यदि लाखों रुपये के विकास कार्यों की वित्तीय जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी, तो आम नागरिक सरकारी खर्च की निगरानी कैसे करेंगे? यदि निर्माण पूरी तरह नियमों के अनुरूप हुआ है, तो लागत और क्षेत्रफल बताने में हिचक क्यों दिखाई जा रही है? क्या नगर पालिका भविष्य में इस कार्य की विस्तृत वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करेगी?
यह मामला अब केवल एक शिलापट्ट तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी धन के उपयोग, प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और जनविश्वास से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन और शासन स्तर के जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे प्रकरण का संज्ञान लेते हैं या नहीं। यदि आवश्यक हुआ तो क्या संबंधित विभाग से इस कार्य की लागत, तकनीकी स्वीकृति और व्यय का सार्वजनिक विवरण जारी कराया जाएगा, या फिर यह सवाल भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ दब जाएगा।
(नोट: इस समाचार में 85 लाख रुपये की लागत संबंधी उल्लेख स्थानीय सूत्रों एवं उपलब्ध दावों पर आधारित है। संबंधित अभिलेखों अथवा आधिकारिक वित्तीय दस्तावेजों के आधार पर इसकी स्वतंत्र पुष्टि किया जाना शेष है।)
