
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। शिक्षा के मंदिर को अगर कोई “घोटालों की प्रयोगशाला” बना दे, सरकारी खजाने को निजी तिजोरी समझ लिया जाए और शिकायतों के निस्तारण के नाम पर सच का गला घोंट दिया जाए, तो सवाल सिर्फ एक कॉलेज पर नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की साख पर खड़ा होता है। कप्तानगंज स्थित श्री गंगा बक्श कनोडिया इंटर कॉलेज इन दिनों ऐसे ही सनसनीखेज आरोपों के चलते सुर्खियों में है, जहां फर्जी हाजिरी, नियम विरुद्ध चयन वेतनमान, लाखों के एरियर भुगतान और आईजीआरएस पर कथित फर्जी निस्तारण का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है।
लोकायुक्त जांच में पहले से घिरे जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त पर अब नए आरोपों की बौछार हो रही है। आरोप है कि कॉलेज के सहायक अध्यापक श्याम नारायण पाण्डेय, वीरेन्द्र पाण्डेय और बर्खास्तगी के बाद भी कथित रूप से तथ्य छिपाकर नौकरी कर रहे देवेन्द्र पाण्डेय को बचाने के लिए पूरा विभागीय तंत्र ढाल बन गया। चर्चा यह भी है कि जिन शिक्षकों का विनियमितीकरण वर्ष 2018 में हुआ, उन्हें चयन वेतनमान का लाभ वर्ष 2008 से ही दे दिया गया। यानी नियम किताबों में पड़े रह गए और सरकारी खजाना कथित रूप से “कागजी खेल” की भेंट चढ़ गया।
सबसे बड़ा सवाल उस एरियर भुगतान को लेकर उठ रहा है, जिसमें जुलाई 2012 से जून 2014 तक विद्यालय में उपस्थिति संदिग्ध होने के बावजूद लाखों रुपये का भुगतान कर दिया गया। आरोप है कि मूल उपस्थिति पंजिका में हस्ताक्षर तक नहीं मिले, फिर भी फर्जी उपस्थिति दिखाकर सरकारी धन निकाल लिया गया। अब जिले में लोग तंज कस रहे हैं—“विद्यालय में पढ़ाई कम, लेकिन कागजों में चमत्कार ज्यादा हो रहा था।”
मामले को और विस्फोटक बनाता है शिक्षा निदेशालय का वह पत्र, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि तत्कालीन जांच में संबंधित शिक्षकों के हस्ताक्षर मूल उपस्थिति पंजिका पर नहीं पाए गए और उनकी कार्यरतता प्रमाणित नहीं हो रही। ऐसे में “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत लागू होना चाहिए था। वित्त नियंत्रक (माध्यमिक) ने भी साफ चेतावनी दी थी कि किसी भी प्रकार के अनियमित भुगतान की जिम्मेदारी जिला विद्यालय निरीक्षक और वित्त एवं लेखाधिकारी की होगी। बावजूद इसके भुगतान होना, पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
अब सबसे ज्यादा चर्चा आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायतों के कथित “मैनेजमेंट” को लेकर हो रही है। सूत्र बताते हैं कि कॉलेज प्रशासन ने मूल उपस्थिति पंजिका, पूर्व डीआईओएस जांच रिपोर्ट, शिक्षा निदेशक के आदेश और वित्त नियंत्रक के निर्देश समेत लगभग 26 पन्नों के दस्तावेज उपलब्ध कराए थे। इन दस्तावेजों में कथित फर्जीवाड़े के कई ठोस साक्ष्य मौजूद थे। लेकिन आरोप है कि डीआईओएस कार्यालय ने उन महत्वपूर्ण दस्तावेजों को दबाकर केवल एक पन्ने की सामान्य आख्या अपलोड कर शिकायत का निस्तारण कर दिया।
अब जिले में चर्चा तेज है कि आखिर किसके संरक्षण में यह खेल चल रहा है? क्यों अब तक न एफआईआर दर्ज हुई, न रिकवरी हुई और न ही विभागीय कार्रवाई आगे बढ़ी? शिक्षा विभाग के गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि यदि निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच हुई, तो सिर्फ शिक्षक ही नहीं बल्कि कई अधिकारियों की भूमिका भी उजागर हो सकती है। फिलहाल कनोडिया इंटर कॉलेज का यह मामला शिक्षा व्यवस्था पर ऐसा दाग बन चुका है, जिसने पूरे विभाग की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

