
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर के जिला मुख्यालय रविन्द्रनगर स्थित मेडिकल कॉलेज में गुरुवार को उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष चारु चौधरी अचानक निरीक्षण पर पहुंच गईं। जिस अस्पताल को गरीबों के इलाज का “मंदिर” कहा जाता है, वहां की हकीकत देखकर खुद आयोग की उपाध्यक्ष का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। निरीक्षण में ऐसा लगा मानो अस्पताल नहीं, बल्कि “रेफरल मंडी” चल रही हो, जहां मरीजों का इलाज कम और निजी जांच केंद्रों की तरफ धकेलने का खेल ज्यादा हो रहा है।
जैसे ही महिला आयोग की उपाध्यक्ष ने वार्डों और ओपीडी का निरीक्षण शुरू किया, मरीजों और तीमारदारों की शिकायतों का बांध टूट पड़ा। किसी ने बताया कि अस्पताल में दवाएं नहीं मिलतीं, तो किसी ने कहा कि सरकारी मशीनें धूल खा रही हैं लेकिन जांच बाहर कराई जा रही है। कई मरीज हाथों में बाहर की जांच पर्चियां लेकर भटकते मिले। सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब स्त्री रोग विशेषज्ञ के कक्ष में निजी अल्ट्रासाउंड सेंटर की रेफरल पर्चियां मिलीं। यह नजारा देखकर साफ हो गया कि सरकारी अस्पताल के भीतर से ही निजी सेंटरों की “सेटिंग” का खेल चल रहा है।
सूत्रों की मानें तो मरीजों को यह कहकर बाहर भेजा जा रहा था कि अस्पताल की जांच “भरोसेमंद नहीं” है। सवाल यह उठता है कि जब सरकारी डॉक्टर ही अपने अस्पताल की व्यवस्था पर भरोसा नहीं कर रहे, तो आखिर गरीब जनता किस पर भरोसा करे? क्या सरकारी अस्पताल अब इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि निजी पैथोलॉजी और अल्ट्रासाउंड सेंटरों के लिए कमीशन एजेंसी बन चुके हैं?
निरीक्षण के दौरान अस्पताल की बदहाल व्यवस्था ने भी स्वास्थ्य विभाग की पोल खोल दी। मरीजों की सुविधा के लिए लगी लिफ्ट बंद मिली, लेकिन उसके आसपास कर्मचारियों की बाइकें आराम फरमाती नजर आईं। वार्डों में गंदगी पसरी हुई थी और दोपहर तक सफाई चलती रही। इस पर महिला आयोग की उपाध्यक्ष ने कर्मचारियों और अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि “अस्पताल में मरीज इलाज के लिए आते हैं, अपमान और यातना झेलने के लिए नहीं।”
जच्चा-बच्चा वार्ड में भर्ती महिलाओं ने आरोप लगाया कि मरीजों की हालत की सही जानकारी तक नहीं दी जाती। वहीं न्यूरो विभाग की एक पर्ची में मरीज को अस्पताल से एक भी दवा न मिलने का मामला सामने आया। यह सब देखकर निरीक्षण स्थल पर मौजूद अधिकारी भी असहज नजर आए।
महिला आयोग की उपाध्यक्ष ने सीएमएस और संबंधित डॉक्टरों को कड़ी चेतावनी देते हुए साफ कहा कि गरीब मरीजों के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने निर्देश दिया कि सभी जांचें अस्पताल परिसर में ही कराई जाएं और मरीजों को दवाएं अस्पताल से उपलब्ध हों। साथ ही 15 दिन के भीतर व्यवस्था सुधारने का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी कि अगर हालात नहीं सुधरे तो लखनऊ से बड़ी कार्रवाई तय मानी जाए।
निरीक्षण खत्म होते-होते अस्पताल प्रशासन में भगदड़ जैसी स्थिति बन गई। कोई फाइलें समेटता दिखा, तो कोई सफाई देता नजर आया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी हवा में तैर रहा है—क्या यह कार्रवाई सिर्फ कैमरों और निरीक्षण तक सीमित रहेगी, या फिर सच में उन सफेद कोट वालों पर भी शिकंजा कसेगा, जिन पर गरीबों के दर्द को “कमाई का जरिया” बनाने के आरोप लग रहे हैं?
