
गांव में समाधान की नीति पर बड़ा सवाल—फोटो, निर्देश और निस्तारण की रिपोर्टों के बीच असली शिकायतकर्ता कहां खड़ा है?
कुशीनगर। उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रामीण जनता की समस्याओं का समाधान गांव में ही कराने के उद्देश्य से ‘ग्राम चौपाल—गांव की समस्या, गांव में समाधान’ जैसी व्यवस्था शुरू की। हर शुक्रवार गांवों में चौपाल लगाकर अधिकारियों की मौजूदगी में ग्रामीणों की समस्याएं सुनने, राजस्व मामलों पर कार्रवाई करने और सरकारी योजनाओं से जुड़ी शिकायतों का समाधान कराने का दावा किया जाता है। व्यवस्था का उद्देश्य साफ है—जनता को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए तहसील और जिला मुख्यालय के चक्कर न लगाने पड़ें।
लेकिन कुशीनगर में जमीनी तस्वीर को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
यदि ग्राम चौपाल में राजस्व संबंधी विवादों से लेकर ग्रामीणों की समस्याओं तक का समाधान गांव में ही होना है, तो फिर शिकायतों के प्रार्थना पत्र आखिर जिला स्तर के अधिकारियों तक क्यों पहुंच रहे हैं? यदि गांव में ही समस्या का समाधान हो रहा है, तो तहसील और जिला मुख्यालय पर फरियादियों की कतार क्यों दिखाई देती है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या सरकार ने कभी यह जांचने की कोशिश की कि ग्राम चौपाल में दर्ज शिकायतों में वास्तव में कितने मामलों का मौके पर समाधान हुआ और कितने मामलों को सिर्फ ‘निस्तारित’ दिखा दिया गया?
कागजों पर व्यवस्था बेहद शानदार नजर आती है। चौपाल लगी, अधिकारी पहुंचे, ग्रामीणों की समस्याएं सुनी गईं, संबंधित अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए गए और फिर तस्वीरें सामने आ गईं। सरकारी सोशल मीडिया पोस्ट में भी व्यवस्था की सफलता का बखान दिखाई देता है। लेकिन सवाल यह है कि कैमरे के सामने समस्या सुनना और जमीन पर समस्या का समाधान करना—क्या दोनों एक ही बात हैं?
अगर किसी ग्रामीण का राजस्व विवाद वर्षों से लंबित है, खतौनी में त्रुटि है, जमीन पर कब्जे का विवाद है, सीमांकन नहीं हो रहा है या किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है, तो क्या केवल चौपाल में उसकी शिकायत सुन लेना ही समाधान माना जाएगा? क्या ‘संबंधित अधिकारी को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश’ लिख देना ही निस्तारण है?
जनता को फोटो नहीं, परिणाम चाहिए।
कुशीनगर जैसे ग्रामीण बहुल जिले में ग्राम चौपाल की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि चौपाल के बाद कितने मामलों में मौके पर कार्रवाई हुई, कितने राजस्व विवादों का समाधान हुआ, कितने पात्र लोगों को योजनाओं का लाभ मिला और कितने मामलों में फरियादी को दोबारा तहसील या जिला मुख्यालय नहीं जाना पड़ा।
यहां सवाल सरकार की नीति पर नहीं, बल्कि नीति के क्रियान्वयन और अधिकारियों की जवाबदेही पर है। सरकार यदि ‘गांव की समस्या, गांव में समाधान’ की नीति लेकर चल रही है तो फिर उसकी नियमित समीक्षा भी होनी चाहिए। क्या ग्राम चौपाल में आए मामलों का स्वतंत्र सत्यापन होता है? क्या शिकायतकर्ता से बाद में पूछा जाता है कि उसकी समस्या वास्तव में हल हुई या नहीं? क्या अधिकारियों द्वारा भेजी गई निस्तारण रिपोर्ट की जमीनी जांच होती है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि चौपाल जनता की समस्या सुनने से ज्यादा सरकारी उपलब्धियों की तस्वीर बनाने का मंच बनती जा रही है?
जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार की नीति एक तरफ है और कुछ अधिकारियों की कार्यप्रणाली दूसरी तरफ। ऊपर से संदेश आता है कि शिकायतों का त्वरित और गुणवत्तापूर्ण समाधान किया जाए, लेकिन नीचे से यदि फरियादी को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें तो फिर ग्राम चौपाल का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।
‘गांव में न्याय’ का दावा तभी सार्थक होगा, जब न्याय गांव में दिखाई भी दे।
कुशीनगर प्रशासन और शासन से अब सीधा सवाल है—ग्राम चौपाल में दर्ज शिकायतों की कितनी जांच हुई? कितने राजस्व मामलों का वास्तविक समाधान हुआ? कितने मामलों में फरियादी संतुष्ट हुआ? और कितने मामलों की निस्तारण रिपोर्ट केवल कागजों पर पूरी हुई?
सरकार यदि वास्तव में जीरो टॉलरेंस, पारदर्शिता और जवाबदेह प्रशासन की नीति पर चल रही है तो इन सवालों के जवाब आंकड़ों और फाइलों से नहीं, बल्कि गांव के फरियादियों के अनुभव से मिलने चाहिए।
वरना जनता यह पूछने को मजबूर होगी कि ग्राम चौपाल ‘गांव की समस्या, गांव में समाधान’ का मंच है या फिर ‘समस्या सुनो, फोटो खिंचाओ और निस्तारण रिपोर्ट लगाओ’ की एक और सरकारी कहानी?
VFT NEWS का सवाल साफ है—गांव में चौपाल है तो फिर न्याय के लिए जिला मुख्यालय तक फरियाद क्यों?
