
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जनपद में निजी अस्पतालों की कार्यशैली एक बार फिर कठघरे में दिखाई दे रही है। पडरौना स्थित चर्चित किलकारी हॉस्पिटल एक नवजात की मौत के बाद फिर सुर्खियों में है। आरोप नए नहीं हैं, बल्कि वही पुराने सवाल दोबारा जिंदा हो उठे हैं—क्या इलाज के नाम पर भरोसा देकर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है? क्या मौत के बाद जांच की जगह “मैनेजमेंट” और “समझौता मॉडल” ने व्यवस्था का रूप ले लिया है?
मामला खड्डा थाना क्षेत्र के सालिकपुर गांव का बताया जा रहा है, जहां की निवासी नंदनी पत्नी विष्णु अपने नवजात बच्चे को तेज धड़कन की शिकायत होने पर उम्मीद की आखिरी डोर पकड़कर पडरौना स्थित किलकारी हॉस्पिटल लेकर पहुंचीं। परिजनों के मुताबिक अस्पताल प्रशासन ने भरोसा दिया कि बच्चा जल्द स्वस्थ हो जाएगा। लेकिन परिवार का आरोप है कि छह दिनों तक भर्ती रखकर इलाज के नाम पर रकम ली जाती रही, जबकि मासूम की हालत लगातार बिगड़ती गई।

आरोप है कि जब स्थिति गंभीर हो गई तब परिजनों से अतिरिक्त धनराशि जमा कराई गई और बाद में बच्चे को गोरखपुर रेफर कर दिया गया। परिवार का दर्दनाक दावा है कि रेफर होने तक उनके मासूम की सांसें थम चुकी थीं।
कैमरों के सामने मां का विलाप… भीतर ‘मैनेजमेंट’ की पटकथा?
घटना के बाद अस्पताल परिसर में भावनात्मक दृश्य देखने को मिला। कैमरों के सामने एक मां अपने बच्चे की मौत का दर्द बयां करती रही, चिकित्सकीय लापरवाही के आरोप लगाती रही, जबकि दूसरी ओर अंदरूनी कमरों में मामला शांत कराने की कवायद तेज होने की चर्चा शुरू हो गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हंगामा बढ़ने पर अस्पताल प्रबंधन ने अपने करीबी लोगों, कुछ कथित मीडिया कर्मियों और पुलिस को मौके पर बुलाया। इसके बाद जो हुआ, उस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
परिजनों का आरोप है कि उन्हें निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई का रास्ता दिखाने के बजाय समझौते की ओर धकेला गया। बताया जाता है कि परिवार को यह तक समझाया गया कि यदि मामला बढ़ाया गया तो नवजात का पोस्टमार्टम होगा, “इतने छोटे बच्चे की चीर-फाड़ से आखिर क्या हासिल होगा?”
सवाल यह है कि क्या किसी पीड़ित परिवार को कानूनी अधिकार बताने की जगह भावनात्मक दबाव में निर्णय लेने को मजबूर किया जाना न्यायसंगत है?
23 हजार में मौत की फाइल बंद?
जानकारी के अनुसार अंततः कथित रूप से 23 हजार रुपये में समझौते की बात तय हुई और स्टाम्प पेपर पर लिखवाकर मामला शांत कराने की कोशिश की गई।
अब जनपद में चर्चा सिर्फ एक मौत की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की हो रही है जिसमें सवाल उठता है—क्या नवजात की जिंदगी की कीमत कुछ हजार रुपये है?
क्या किसी स्टाम्प पेपर पर लिखे समझौते से चिकित्सकीय जवाबदेही समाप्त हो जाती है? क्या अस्पताल में इलाज के दौरान मौत होने पर स्वतंत्र जांच, मेडिकल समीक्षा और स्वास्थ्य विभागीय कार्रवाई आवश्यक नहीं होती?
जानकारों की मानें तो चिकित्सकीय लापरवाही के आरोपों वाले मामलों में स्वास्थ्य विभाग, मेडिकल बोर्ड और विधिक प्रक्रिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर तस्वीर कई बार अलग दिखाई देती है—जहां जांच से पहले “सेटिंग” की फुसफुसाहट सुनाई पड़ने लगती है।
पुराने आरोप, नया विवाद… आखिर कब तक?
स्थानीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि किलकारी हॉस्पिटल का नाम पहले भी विवादों में आता रहा है। कभी इलाज में देरी, कभी गलत दवा या इंजेक्शन लगाने के आरोप, तो कभी हालत बिगड़ने पर देर से रेफर करने जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं।
सूत्रों की मानें तो पूर्व में भी कुछ मामलों में विरोध-प्रदर्शन और शिकायतों की चर्चा हुई, लेकिन बाद में प्रकरण ठंडे पड़ गए।
स्थानीय लोगों के बीच एक कटाक्ष तेजी से सुनाई दे रहा है—“पहले भरोसा, फिर बिल, फिर रेफर… और आखिर में समझौते का ऑफर।”
यदि ऐसे आरोप लगातार उठ रहे हैं तो बड़ा प्रश्न यह है कि संबंधित अस्पतालों की कार्यप्रणाली की नियमित समीक्षा आखिर कौन कर रहा है?
स्वास्थ्य विभाग की खामोशी भी सवालों के घेरे में
जनपद में कई निजी अस्पतालों के संचालन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगते रहे हैं कि अनेक संस्थान सीमित संसाधनों, अपर्याप्त विशेषज्ञता और कमजोर आपातकालीन व्यवस्थाओं के बावजूद संवेदनशील चिकित्सा सेवाएं दे रहे हैं।

ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि नवजात एवं शिशु उपचार जैसी अत्यंत संवेदनशील सेवाओं की नियमित मॉनिटरिंग कितनी प्रभावी है? क्या निरीक्षण सिर्फ कागजी प्रक्रिया बनकर रह गया है?
यदि किसी संस्थान पर बार-बार गंभीर आरोप लगते हैं तो क्या उसकी उच्चस्तरीय समीक्षा नहीं होनी चाहिए? क्या जिम्मेदार विभाग को इन घटनाओं की जानकारी नहीं मिलती, या फिर जानकारी के बावजूद कार्रवाई की गति धीमी पड़ जाती है?
पुलिस की भूमिका पर भी उठे सवाल
घटना के बाद सबसे तीखी चर्चा पुलिस की भूमिका को लेकर भी है। यदि किसी परिवार ने चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाया है तो क्या प्राथमिकता निष्पक्ष जांच होनी चाहिए या समझौते का रास्ता?
यही प्रश्न अब प्रशासनिक गलियारों तक पहुंच रहा है।
गरीब की मजबूरी और निजी इलाज का कठोर सच
ग्रामीण परिवार अपने बच्चे को बचाने की उम्मीद में उधार लेते हैं, गहने गिरवी रखते हैं, जमीन बेचते हैं। लेकिन जब बदले में मौत, आरोप और समझौते की चर्चाएं सामने आती हैं तो भरोसे की नींव कमजोर पड़ती है।
किलकारी हॉस्पिटल को लेकर उठे सवाल अब केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विश्वसनीयता पर बहस बन चुके हैं।
अब देखना यह होगा कि इस मामले में जिम्मेदार विभाग निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और जवाबदेही सुनिश्चित करता है या फिर यह प्रकरण भी उन फाइलों में शामिल हो जाएगा, जहां समय के साथ सवाल दब जाते हैं, लेकिन पीड़ित परिवार का दर्द जीवित रहता है।
