
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर, विशेष संवाददाता
कुशीनगर। विशुनपुरा विकास खण्ड की मनीकौरा ग्राम पंचायत में 15वें वित्त आयोग की धनराशि से स्थापित किए जा रहे आरओ प्लांट को लेकर उठे सवाल अब केवल एक विकास कार्य तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि पूरे पंचायत प्रशासन और निगरानी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। लाखों रुपये के भुगतान, अधूरे कार्य, गुणवत्ता संबंधी शिकायतों और जिम्मेदारों के विवादित बयानों के बावजूद प्रशासनिक मशीनरी की चुप्पी ने ग्रामीणों के मन में संदेह को और गहरा कर दिया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जिस परियोजना का उद्देश्य गांव के लोगों को स्वच्छ और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना था, वही परियोजना अब कथित वित्तीय अनियमितताओं और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक बनती जा रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब मामला सार्वजनिक रूप से सामने आ चुका है, तब भी जांच और कार्रवाई का अभाव आखिर किस ओर इशारा कर रहा है?
अधूरे कार्य पर भुगतान, आखिर किस आधार पर?
मनीकौरा में स्थापित आरओ प्लांट की कुल लागत लगभग 4.50 लाख रुपये बताई जा रही है। आरोप है कि कार्य पूर्ण हुए बिना ही लगभग 3.66 लाख रुपये से अधिक का भुगतान कर दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि जब मौके पर कार्य पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था, तब इतनी बड़ी धनराशि जारी किए जाने का औचित्य क्या था?

सरकारी योजनाओं में भुगतान की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से निर्धारित होती है। तकनीकी सत्यापन, कार्य की माप, फोटोग्राफी, जियो टैगिंग और अन्य आवश्यक औपचारिकताओं के बाद ही भुगतान की अनुमति दी जाती है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या मनीकौरा में भी इन सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था? यदि किया गया तो संबंधित अभिलेख सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे हैं?
प्रधान और सचिव के बयान बने चर्चा का विषय
पूरा मामला तब और गंभीर हो गया जब सवाल पूछे जाने पर ग्राम पंचायत के जिम्मेदार पदाधिकारियों द्वारा दिए गए कथित बयान चर्चा का विषय बन गए।
जब ग्राम प्रधान नंदलाल साहनी से पूछा गया कि कार्य पूरा होने से पहले भुगतान कैसे हो गया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा कि “अधिकारी पूछेंगे तो हम उनसे बात कर लेंगे।”
यह बयान कई नए सवाल पैदा करता है। क्या सरकारी धन के उपयोग पर जवाबदेही का स्थान अब व्यक्तिगत प्रभाव और संपर्कों ने ले लिया है? क्या नियम और प्रक्रियाएं केवल कागजों तक सीमित रह गई हैं?
वहीं ग्राम सचिव राजकिशोर राय का कथित बयान “बजट से क्या मतलब, आप अपनी मंशा बताइए” भी ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। पंचायत के धन का हिसाब मांगना यदि अनुचित माना जा रहा है तो फिर पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा का क्या अर्थ रह जाता है?
प्रशासनिक खामोशी से बढ़ा संदेह
मामला मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद ग्रामीणों को उम्मीद थी कि संबंधित विभाग तत्काल जांच शुरू करेगा और स्थिति स्पष्ट करेगा। लेकिन एक पखवाड़े से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न तो किसी जांच समिति के गठन की सूचना सामने आई और न ही किसी अधिकारी का आधिकारिक बयान।
यही कारण है कि गांव में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है? क्या मामला किसी प्रभावशाली संरक्षण के कारण दबाया जा रहा है? क्या जिम्मेदार अधिकारी शिकायतों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं? या फिर कहीं न कहीं पूरे प्रकरण को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की जा रही है?
ग्रामीणों का कहना है कि यदि आरोप गलत हैं तो प्रशासन को तत्काल जांच कराकर सच्चाई सामने लानी चाहिए। लेकिन यदि आरोप सही हैं तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
नियम क्या कहते हैं?
पंचायतीराज विभाग और वित्त आयोग की योजनाओं के जानकार बताते हैं कि किसी भी निर्माण कार्य में भुगतान से पहले निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक होता है। कार्य की प्रगति का सत्यापन, माप पुस्तिका (एमबी) में प्रविष्टि, तकनीकी स्वीकृति और अन्य औपचारिकताओं के बाद ही धनराशि जारी की जाती है।
यदि मनीकौरा में भुगतान रनिंग बिल के रूप में किया गया है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि कुल कितना कार्य पूर्ण माना गया था, किस अधिकारी ने उसका सत्यापन किया और किस आधार पर भुगतान की अनुमति प्रदान की गई। जब तक इन सवालों के जवाब सामने नहीं आते, तब तक संदेह समाप्त होना संभव नहीं है।
शुद्ध पानी की योजना खुद सवालों के घेरे में
जिस आरओ प्लांट को ग्रामीणों के स्वास्थ्य और सुविधा के लिए स्थापित किया जाना था, वही आज विवादों का केंद्र बन गया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें आज तक परियोजना की वास्तविक लागत, भुगतान की स्थिति और कार्य पूर्ण होने की समयसीमा के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।
गांव के लोगों का आरोप है कि विकास कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए लगाए गए सूचना बोर्ड भी कई बार केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो संबंधित अभिलेख सार्वजनिक किए जाने में हिचकिचाहट क्यों है?
उठ रहे हैं कई यक्ष प्रश्न
मनीकौरा आरओ प्लांट प्रकरण अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है—
अधूरे कार्य पर लाखों रुपये का भुगतान किस आधार पर किया गया?
भुगतान से पहले कार्य की गुणवत्ता और प्रगति का सत्यापन किस अधिकारी ने किया?
क्या तकनीकी मानकों का पालन किया गया?
प्रधान और सचिव के कथित बयानों का अधिकारियों ने संज्ञान लिया या नहीं?
मीडिया में मामला आने के बाद भी जांच प्रक्रिया शुरू क्यों नहीं हुई?
यदि सब कुछ नियमसम्मत है तो अभिलेख सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे?
इन सवालों के जवाब केवल मनीकौरा ही नहीं, बल्कि पूरे पंचायत प्रशासन की विश्वसनीयता से जुड़े हुए हैं।
अब कार्रवाई का इंतजार
मनीकौरा आरओ प्लांट का मामला अब प्रशासन के लिए भी एक परीक्षा बन गया है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच कराकर तथ्य सार्वजनिक नहीं किए गए तो लोगों का भरोसा सरकारी योजनाओं और पंचायत व्यवस्था दोनों से कमजोर होगा।

अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित विभागों पर टिकी हैं। जनता जानना चाहती है कि आखिर सरकारी धन के उपयोग पर उठे इतने गंभीर सवालों का जवाब कौन देगा और कब देगा। क्योंकि लोकतंत्र में विकास योजनाओं का उद्देश्य केवल निर्माण कराना नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी होता है।
