
कुशीनगर। पडरौना स्थित श्री चित्रगुप्त मंदिर की भूमि और उसके प्रबंधन को लेकर चल रहा विवाद अब केवल न्यायालय तक सीमित नहीं रह गया है। चित्रगुप्त मंदिर समिति न्यास (ट्रस्ट) के अध्यक्ष नरेंद्र वर्मा ने आरोप लगाया है कि अदालत में दायर वाद वापस लेने के लिए उन्हें मोबाइल फोन पर धमकी दी गई है। इस आरोप के सामने आने के बाद मामला धार्मिक आस्था, मंदिर संपत्ति की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ा संवेदनशील विषय बन गया है।
ट्रस्ट अध्यक्ष के अनुसार, श्री चित्रगुप्त मंदिर वर्षों पुराना धार्मिक स्थल है और मंदिर परिसर से जुड़ी भूमि पर लंबे समय से गौशाला संचालित हो रही है। उनका दावा है कि मंदिर के रखरखाव, जीर्णोद्धार, धार्मिक आयोजनों तथा विकास कार्यों का दायित्व लगातार ट्रस्ट निभाता आ रहा है। इसी बीच कुछ लोगों द्वारा मंदिर की भूमि पर स्वामित्व का दावा करते हुए निर्माण कार्य की कोशिश किए जाने पर ट्रस्ट ने सिविल न्यायालय की शरण ली।
नरेंद्र वर्मा का आरोप है कि न्यायालय में मामला दर्ज होने के बाद पहले समझौते का दबाव बनाया गया और बाद में कथित रूप से वाद वापस लेने की चेतावनी दी गई। उनका कहना है कि सोमवार को मोबाइल फोन के माध्यम से उन्हें मुकदमा वापस लेने के लिए कहा गया तथा गंभीर परिणाम भुगतने की बात भी कही गई। ट्रस्ट अध्यक्ष का दावा है कि बातचीत का स्वर सामान्य नहीं बल्कि धमकीपूर्ण था, जिससे उन्होंने स्वयं और अन्य ट्रस्ट पदाधिकारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की है।
ट्रस्ट का यह भी आरोप है कि मंदिर की भूमि पर अवैध कब्जे की नीयत से कुछ लोगों द्वारा एक अलग संस्था बनाकर धार्मिक संपत्ति का उपयोग निजी व्यावसायिक हितों के लिए करने की कोशिश की जा रही है। ट्रस्ट का कहना है कि यदि ऐसा होता है तो इससे न केवल मंदिर की परंपरा प्रभावित होगी बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था को भी ठेस पहुंचेगी।
नरेंद्र वर्मा ने प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, कथित धमकी की जांच कर दोषियों के विरुद्ध विधिक कार्रवाई करने तथा ट्रस्ट पदाधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में ट्रस्ट के किसी भी पदाधिकारी के साथ कोई अप्रिय घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी उन लोगों पर होगी जिन पर धमकी देने और दबाव बनाने का आरोप लगाया गया है।
इस घटनाक्रम के बाद ट्रस्ट से जुड़े सदस्यों में भी नाराजगी देखी जा रही है। उनका कहना है कि जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है तो किसी भी पक्ष को कानून अपने हाथ में लेने या दबाव बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उनका मानना है कि ऐसे मामलों का समाधान केवल न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक कार्रवाई के माध्यम से ही संभव है।
उधर, इस पूरे प्रकरण में जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं, उनकी ओर से समाचार लिखे जाने तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। यदि उनका पक्ष प्राप्त होता है तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
फिलहाल यह मामला प्रशासन और पुलिस के लिए भी गंभीर परीक्षा माना जा रहा है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कथित धमकी के आरोपों की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और न्यायालय में लंबित विवाद के बीच प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाता है।
