
मठ बनाम कब्रिस्तान: डुमरिया की जमीन पर संग्राम, विधायक की एंट्री से मचा प्रशासनिक भूचाल
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
अमित कुमार कुशवाहा
कुशीनगर। तरयासुजान थाना क्षेत्र के डुमरिया मठ में कब्रिस्तान और मठ की भूमि को लेकर छिड़ा विवाद अब महज एक राजस्व मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक कार्यशैली, सरकारी अभिलेखों की विश्वसनीयता और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है। जमीन के इस बहुचर्चित प्रकरण में क्षेत्रीय विधायक डॉ. असीम कुमार राय की सीधी दखल के बाद तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली चर्चा के केंद्र में आ गई है।
मठ के महंत एवं पूर्व प्रधान रूद्रानंद गिरी ने विधायक से मुलाकात कर दस्तावेजों का विस्तृत संकलन सौंपते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कब्रिस्तान की खतौनी में मात्र 48 डिसमिल भूमि दर्ज है, जबकि मौके पर लगभग 100 डिसमिल क्षेत्र में चाहरदीवारी खड़ी कर कब्जा किए जाने की स्थिति दिखाई पड़ रही है। महंत का दावा है कि यदि राजस्व अभिलेखों और स्थल की वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष मिलान कराया जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।
विवाद का सबसे चर्चित पहलू यह है कि शिकायत और दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने के बावजूद तीन महीने बीत जाने पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। महंत रूद्रानंद गिरी का आरोप है कि उन्होंने पुरातत्व विभाग से जांच कराए जाने संबंधी अभिलेख और शिकायत पत्र तहसील प्रशासन को सौंपे थे, लेकिन फाइलें आगे बढ़ने के बजाय दफ्तरों की अलमारियों में कैद होकर रह गईं। क्षेत्र में अब यह चर्चा तेज है कि आखिर इतने संवेदनशील मामले में जांच की रफ्तार इतनी सुस्त क्यों रही।
मामला जब विधायक डॉ. असीम कुमार राय तक पहुंचा तो उन्होंने इसे गंभीरता से लेते हुए तत्काल तहसीलदार तमकुहीराज से दूरभाष पर वार्ता की। सूत्रों के अनुसार विधायक ने स्पष्ट निर्देश दिए कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए तथा किसी भी स्तर पर लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि जांच में निर्धारित रकबे से अधिक भूमि पर कब्जा या किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो नियमानुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
महंत रूद्रानंद गिरी का कहना है कि वर्षों पुराने धार्मिक स्थल की भूमि को विवादित बनाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ प्रभावशाली तत्व सुनियोजित तरीके से मठ की संपत्ति पर नजर गड़ाए हुए हैं। उनका दावा है कि प्रशासनिक जांच ही पूरे मामले की सच्चाई उजागर कर सकती है।
फिलहाल डुमरिया मठ की यह भूमि अब राजस्व अभिलेखों, प्रशासनिक निष्क्रियता के आरोपों और राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। क्षेत्रवासियों की निगाहें अब तहसील प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि जांच निष्पक्ष हुई तो जमीन का सच सामने आएगा, लेकिन यदि मामला फिर कागजी खानापूर्ति में उलझा तो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल और भी तीखे हो सकते हैं।
