
कभी विकास की धड़कन थी डिस्टलरी, आज वीरानी और सरकारी उदासीनता की प्रतीक
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। पूर्वांचल के औद्योगिक इतिहास में कभी गर्व और समृद्धि का प्रतीक रही कप्तानगंज डिस्टलरी आज खंडहरों में तब्दील होकर व्यवस्था की नाकामी की दर्दनाक कहानी बयां कर रही है। जिस परिसर में कभी मशीनों की गर्जना सुनाई देती थी, जहां हजारों श्रमिकों की मेहनत से विकास का पहिया घूमता था, वहीं आज सन्नाटा पसरा है। टूटी दीवारें, जर्जर भवन और जंग खाए ढांचे मानो हर गुजरने वाले से एक ही सवाल पूछ रहे हैं—आखिर इस औद्योगिक विरासत का हत्यारा कौन है?

करीब 49 एकड़ क्षेत्रफल में फैली इस ऐतिहासिक डिस्टलरी की स्थापना वर्ष 1944-45 में हुई थी। आजादी के बाद यह केवल एक कारखाना नहीं रही, बल्कि पूर्वांचल की आर्थिक धुरी बन गई। हजारों श्रमिकों को रोजगार मिला, गन्ना किसानों को स्थायी बाजार मिला और कप्तानगंज का नाम राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगा। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस संस्थान ने दशकों तक क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, उसकी चिमनी वर्ष 2008 में आखिरी बार धुआं उगलने के बाद हमेशा के लिए शांत हो गई।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि पूर्वांचल की शान कही जाने वाली यह इकाई देखते-देखते मौत के मुंह में चली गई? क्या आर्थिक संकट इतना बड़ा था कि समाधान संभव नहीं था? क्या सरकारों ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया? या फिर कुछ ऐसे स्वार्थी तत्व सक्रिय थे जिन्हें इस विशाल संपत्ति के उजड़ने में अपना फायदा दिखाई दे रहा था?
स्थानीय लोगों का कहना है कि डिस्टलरी का बंद होना केवल एक उद्योग का बंद होना नहीं था, बल्कि हजारों परिवारों के सपनों का टूटना था। जिन श्रमिकों ने अपना पूरा जीवन इस कारखाने को दिया, वे आज भी बकाया भुगतान और न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। किसानों की आय प्रभावित हुई, छोटे व्यापारियों का कारोबार चौपट हो गया और पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां धीरे-धीरे कमजोर पड़ती चली गईं।
चिंता की बात यह भी है कि डिस्टलरी बंद होने के बाद उसकी सुरक्षा और संरक्षण को लेकर कोई गंभीर प्रयास दिखाई नहीं दिया। करोड़ों रुपये मूल्य की मशीनें कबाड़ में बदलती रहीं, भवन जर्जर होते गए और जिम्मेदार विभाग फाइलों में विकास के दावे लिखते रहे। ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी ने जानबूझकर इस औद्योगिक धरोहर को समय के हवाले छोड़ दिया हो।
समाजसेवी एवं जनहित के मुद्दों को मुखरता से उठाने वाले राम नरेश अग्रहरी कहते हैं कि यदि प्रदेश में बंद पड़ी चीनी मिलों और अन्य औद्योगिक इकाइयों को पुनर्जीवित करने की योजनाएं बन सकती हैं तो कप्तानगंज डिस्टलरी को पुनर्जीवित करने की पहल क्यों नहीं हुई? आखिर ऐसा कौन सा कारण था कि यह ऐतिहासिक संस्थान सरकारी प्राथमिकताओं से बाहर हो गया? उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इसकी बहुमूल्य जमीन और संपत्तियों पर किसी की नजर थी, या फिर प्रशासनिक उदासीनता और प्रबंधन की विफलता ने मिलकर इसे बर्बादी की राह पर पहुंचा दिया?
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि कप्तानगंज डिस्टलरी का मामला केवल एक बंद कारखाने का नहीं बल्कि सरकारी जवाबदेही का भी है। जब विकास, निवेश और रोजगार सृजन के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, तब यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि हजारों लोगों को रोजगार देने वाली ऐतिहासिक इकाई को बचाने के लिए आखिर कौन सा प्रयास किया गया?
आज कप्तानगंज डिस्टलरी की वीरान चिमनी केवल जंग लगे लोहे का ढांचा नहीं है। वह प्रशासनिक उदासीनता, नीतिगत विफलताओं और विकास के खोखले दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुकी है। यह खामोश जरूर है, लेकिन इसकी खामोशी व्यवस्था से जवाब मांग रही है।
जब तक इस औद्योगिक विरासत के पतन की वास्तविक जिम्मेदारी तय नहीं होती और इसके पुनर्जीवन की दिशा में ठोस पहल नहीं होती, तब तक कप्तानगंज डिस्टलरी का खंडहर पूर्वांचल के विकास मॉडल पर सवाल उठाता रहेगा। आखिर पूर्वांचल की इस औद्योगिक मशाल को बुझाने वाला कौन था—यह सवाल आज भी जनता के बीच गूंज रहा है और जवाब का इंतजार कर रहा है।
