
12 लाख रुपये में सरकारी जमीन का कथित सौदा? बचत, बंजर और सिंचाई विभाग की भूमि पर निजी कब्जे के आरोप से मचा हड़कंप
तहसील से चंद कदमों की दूरी पर सरकारी संपत्ति की कथित बंदरबांट! किसके संरक्षण में चल रहा जमीन का खेल, जिलाधिकारी की निष्पक्ष जांच से खुल सकते हैं कई राज
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता।
कुशीनगर। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार जहां भू-माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई और सरकारी जमीनों को अवैध कब्जों से मुक्त कराने का दावा कर रही है, वहीं पडरौना तहसील क्षेत्र से सामने आए कथित भूमि प्रकरण ने सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पडरौना-सोहरौना सीमा पर कसया-पडरौना मार्ग के किनारे स्थित बेशकीमती बचत, बंजर और सिंचाई विभाग से संबंधित भूमि पर कथित प्लॉटिंग और निजी कब्जे का मामला चर्चा में है। आरोप है कि सरकारी जमीन की पैमाइश कराकर उसे निजी व्यक्तियों के हवाले करने का रास्ता तैयार किया गया। इतना ही नहीं, करोड़ों रुपये मूल्य की बताई जा रही भूमि का कथित सौदा महज 12 लाख रुपये में किए जाने की बात भी सामने आ रही है।
सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि इस पूरे प्रकरण में एक प्रभावशाली लेखपाल के साथ दो अन्य लेखपालों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
तहसील के नजदीक जमीन का खेल, जिम्मेदारों को भनक तक नहीं?
हैरानी की बात यह है कि जिस स्थान पर कथित रूप से जमीन की पैमाइश और प्लॉटिंग का मामला उठ रहा है, वह पडरौना तहसील कार्यालय से लगभग 300 मीटर की दूरी पर बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि यदि सरकारी भूमि पर निजी कब्जे की गतिविधियां चल रही थीं, तो स्थानीय राजस्व प्रशासन की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां थी?

क्या संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी? यदि जानकारी थी तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी नहीं थी तो तहसील मुख्यालय के इतने करीब सरकारी संपत्ति की सुरक्षा कैसे प्रभावित हुई?
पहले पैमाइश, फिर कब्जे का रास्ता? तीन लेखपालों की भूमिका की जांच जरूरी
इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू कथित पैमाइश है। आरोप है कि तीन लेखपालों ने संबंधित जमीन की पैमाइश की और इसके बाद निजी व्यक्तियों तथा प्लॉट कारोबार से जुड़े लोगों को कब्जा दिलाने में भूमिका निभाई।
अब प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि पैमाइश किसके आदेश पर हुई? संबंधित भूमि की खतौनी और खसरे का सत्यापन किया गया था या नहीं? क्या सिंचाई विभाग के अधिकारियों को मौके पर बुलाया गया था? क्या पैमाइश की लिखित रिपोर्ट तैयार कर सक्षम अधिकारियों को भेजी गई थी?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी भूमि को निजी व्यक्ति के कब्जे में देने का अधिकार आखिर किस अधिकारी के पास था और क्या इस संबंध में कोई वैधानिक आदेश जारी हुआ था?
12 लाख में करोड़ों की जमीन! कथित सौदे की परतें खोलने की मांग
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि सड़क किनारे स्थित इस बेशकीमती जमीन का बाजार मूल्य करोड़ों रुपये हो सकता है, जबकि कथित तौर पर 12 लाख रुपये में सौदा किए जाने का आरोप लगाया जा रहा है। यदि यह आरोप सही साबित होता है तो यह केवल जमीन पर कब्जे का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा, राजस्व व्यवस्था और संभावित आर्थिक अनियमितताओं की गंभीर जांच का विषय बन सकता है।
हालांकि, वास्तविक सौदे की रकम, भूमि का क्षेत्रफल और बाजार मूल्य का निर्धारण आधिकारिक अभिलेखों एवं जांच के बाद ही संभव है।
सिंचाई विभाग की जमीन पर भी सवाल, नाले के दोनों तरफ प्लॉटिंग की चर्चा
मामले में सिंचाई विभाग के नाले के दोनों तरफ स्थित जमीन को लेकर भी गंभीर आरोप हैं। यदि संबंधित भूखंड विभागीय संपत्ति हैं, तो उनकी सीमाओं और स्वामित्व का सत्यापन सिंचाई विभाग के मूल अभिलेखों से कराया जाना आवश्यक है। बिना वैधानिक अनुमति वहां निजी कब्जा, निर्माण या प्लॉटिंग की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों के साथ जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांची जानी चाहिए।

जिलाधिकारी की निष्पक्ष जांच से खुलेगा पूरा खेल?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। आवश्यकता है कि जिलाधिकारी के निर्देश पर राजस्व विभाग और सिंचाई विभाग की संयुक्त टीम गठित कर मौके की निष्पक्ष पैमाइश कराई जाए। मूल खतौनी, खसरा, राजस्व नक्शा, भूमि की श्रेणी, पैमाइश रिपोर्ट, नामांतरण संबंधी अभिलेख और कथित सौदे से जुड़े दस्तावेजों की जांच हो।
यदि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा अथवा कर्मचारियों की मिलीभगत प्रमाणित होती है तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी जमीन को भू-माफियाओं से बचाने की जिम्मेदारी जिन राजस्वकर्मियों पर है, यदि उन्हीं पर सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में पहुंचाने के आरोप लग रहे हैं, तो जांच की शुरुआत आखिर किससे होगी? योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति की असली परीक्षा ऐसे ही मामलों में होनी है। क्या प्रशासन करोड़ों की सरकारी संपत्ति को कथित कब्जे से मुक्त कराएगा या यह मामला भी जांच और फाइलों के बीच दबकर रह जाएगा?
नोट: समाचार में उल्लिखित आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना शेष है। संबंधित लेखपालों, राजस्व अधिकारियों, सिंचाई विभाग तथा कथित लाभार्थियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
