
🔵 फाइलों में लहलहाते पेड़, गांवों में धूल उड़ाती जमीन
🔴 साहब! जनता पूछ रही है—आखिर गए कहां 39 लाख पौधे?
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जनपद में वृक्षारोपण महाभियान-2025 के तहत 39 लाख से अधिक पौधे लगाए जाने के सरकारी दावों ने एक बार फिर हरियाली की तस्वीर पेश की है। सरकारी आंकड़ों में कुशीनगर मानो हरे-भरे जंगलों का साम्राज्य बन चुका है। लेकिन जब इन दावों की पड़ताल धरातल पर की जाती है तो तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है। सवाल उठ रहा है कि यदि लाखों पौधे वास्तव में लगाए गए थे, तो जिले के वे गांव आज भी हरियाली के लिए तरस क्यों रहे हैं, जिनके नाम तक जंगलों की विरासत को दर्शाते हैं?
जंगल बेलवा, जंगल खिरकिया, जंगल अमवा, जंगल जगदीशपुर, जंगल पिपरासी और ऐसे ही अनेक गांव आज भी अपने नाम में “जंगल” शब्द तो ढो रहे हैं, लेकिन वहां जंगल का अस्तित्व दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। मानो नाम इतिहास का हो और वर्तमान में केवल बंजर सच्चाई बची हो। गांवों के बुजुर्ग बताते हैं कि कभी यहां पेड़ों की ऐसी भरमार थी कि सूरज की किरणें भी धरती तक पहुंचने में संघर्ष करती थीं। आज वही इलाके खुली जमीन, खेतों और बढ़ती आबादी के बीच अपनी पुरानी पहचान खो चुके हैं।

वृक्षारोपण अभियानों का सरकारी रिकॉर्ड देखिए तो लगता है कि हर साल धरती पर हरियाली की क्रांति उतर रही है। लक्ष्य तय होते हैं, मंत्री और अधिकारी पौधे लगाते हैं, फोटो खिंचते हैं, प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं और अगले दिन सुर्खियां बनती हैं—”इतने लाख पौधे लगाए गए”, “इतिहास रचा गया”, “हरित क्रांति की ओर कदम”। लेकिन सवाल यह है कि क्या हरियाली फोटो खिंचवाने से आती है या पौधों को पेड़ बनाने से?
स्थानीय लोगों का कहना है कि अधिकांश स्थानों पर पौधरोपण के बाद न तो सिंचाई की व्यवस्था होती है, न सुरक्षा की और न ही निगरानी की। पौधे कुछ दिनों तक सरकारी उपलब्धि बनकर जीते हैं और फिर धीरे-धीरे सूखकर आंकड़ों की कब्र में दफन हो जाते हैं। लेकिन अगले वर्ष फिर नया लक्ष्य, नया अभियान और नई सफलता की कहानी लिख दी जाती है।
सबसे बड़ा सवाल वन विभाग की जवाबदेही पर है। यदि पिछले वर्षों में करोड़ों पौधे लगाए गए थे तो विभाग यह क्यों नहीं बताता कि उनमें से कितने पौधे आज जीवित हैं? कितने पौधे वृक्ष बन चुके हैं? कितने स्थानों पर वास्तविक हरित क्षेत्र विकसित हुआ है? आखिर जनता को पौधे लगाने का आंकड़ा तो बताया जाता है, लेकिन पौधे बचाने का हिसाब क्यों नहीं दिया जाता?

पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। सरकारी मशीनरी सक्रिय दिखाई देती है। लेकिन धरातल पर परिणाम तलाशने निकलें तो हरियाली कम और सवाल ज्यादा दिखाई देते हैं। यही वजह है कि अब लोगों के बीच यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि कहीं वृक्षारोपण अभियान केवल कागजी उपलब्धियों का उत्सव तो नहीं बन गया?
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि अब समय पौधों की संख्या गिनने का नहीं, बल्कि जीवित पेड़ों की गणना करने का है। जब तक वृक्षारोपण की स्वतंत्र जांच नहीं होगी और सर्वाइवल रेट सार्वजनिक नहीं किया जाएगा, तब तक लाखों पौधों के दावे केवल सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ाते रहेंगे।
जनता यह भी पूछ रही है कि यदि 39 लाख पौधे लगाए गए हैं तो उनका भौतिक सत्यापन क्यों नहीं कराया जाता? आखिर वह कौन-से स्थान हैं जहां यह हरियाली खड़ी है? यदि पौधे जीवित हैं तो उन्हें जनता के सामने क्यों नहीं लाया जाता? और यदि सूख गए हैं तो उनकी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जाती?
आज कुशीनगर में चर्चा किसी पौधे की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है। सवाल केवल हरियाली का नहीं, बल्कि सरकारी धन, पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों का भी है। क्योंकि जंगल केवल रिपोर्टों में नहीं उगते, वे धरती पर दिखाई देते हैं।
सवाल सीधा और चुभता हुआ है—यदि सरकारी फाइलों में 39 लाख पौधों का जंगल खड़ा हो चुका है तो फिर “जंगल” नाम वाले गांव आज भी जंगल से खाली क्यों हैं? आखिर कुशीनगर में हरियाली धरती पर उगी है या सिर्फ कागजों में?
अब निगाहें वन विभाग और प्रशासन पर हैं। जनता जवाब चाहती है, क्योंकि पेड़ों की गिनती से ज्यादा जरूरी उनकी मौजूदगी है। और जब सवाल 39 लाख पौधों का हो, तो जवाब भी उतना ही बड़ा होना चाहिए।
